भारतीय संविधान और टी.टी. कृष्णामाचारी
टी.टी. कृष्णामाचारी का प्रारंभिक जीवन
हमारा देश सन् 1947 में अंग्रेज़ों की अधीनता से स्वतंत्र हुआ। तब विविधताओं से सम्पन्न भारत के शासन संचालन के लिए एक सुव्यवस्थित शासन प्रणाली की आवश्यकता थी। इसी उद्देश्य से भारत के संविधान के निर्माण की आवश्यकता महसूस की गई।
संविधान निर्माण के लिए संविधान सभा ने 29 अगस्त 1947 को सात सदस्यों वाली एक मसौदा समिति का गठन किया। इस मसौदा समिति का मुख्य कार्य भारत के संविधान का प्रारूप तैयार करना था। मसौदा समिति से आशय ऐसे व्यक्तियों के समूह से है, जो संविधान का मसौदा तैयार करने के लिए एक साथ बैठते हैं।
इस समिति के अध्यक्ष डॉ. बी. आर. अंबेडकर थे। अन्य छह सदस्य थे-
डॉ. के. एम. मुंशी, सैयद मोहम्मद सादुल्ला, अल्लादी कृष्णास्वामी अय्यर, गोपालस्वामी अयंगार, एन. माधव राव (जिन्होंने बी. एल. मित्र का स्थान लिया थे) तथा टी. टी. कृष्णामाचारी (जिन्होंने डी. पी. खेतान का स्थान लिया थे)।
वर्तमान में भारतीय संविधान संसार का सबसे लंबा लिखित संविधान है। इसमें 25 भाग, 395 अनुच्छेद, 12 अनुसूचियाँ तथा 106 संशोधन हैं। मूल संविधान के हिंदी संस्करण का सुलेखन वसंत कृष्ण वैद्य द्वारा किया गया था। इसकी सजावट नंदलाल बोस एवं राम मनोहर सिन्हा के नेतृत्व में शांति निकेतन के कलाकारों द्वारा की गई थी। मूल संविधान अंग्रेज़ी में प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा द्वारा इटैलिक शैली में लिखा गया था।
टी. टी. कृष्णामाचारी का जन्म सन् 1899 में चेन्नई (तत्कालीन मद्रास) में हुआ था। वे उच्च न्यायालय के न्यायाधीश टी. टी. रंगाचारी के पुत्र थे। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक प्रमुख नेता और संविधान की मसौदा समिति के सदस्य थे। भारत के उपवायसराय के रूप में वर्ष 1947 से 1950 तक कार्य किए।
संविधान सभा और मसौदा समिति में भूमिका
टी. टी. कृष्णामाचारी एक उद्योगपति भी थे। उन्होंने सन् 1928 में ‘टीटीके ग्रुप’ नामक एक भारतीय औद्योगिक समूह की स्थापना की, जो अपने प्रेस्टीज ब्रांड के लिए प्रसिद्ध था। मसौदा समिति के सदस्य के रूप में उन्होंने लगभग 4014 घंटे समिति के कार्यों में समर्पित किए। उन्होंने सभा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा आपातकालीन प्रावधानों जैसे विषयों पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका लोकप्रिय उपनाम ‘टीटीके’ था।
सन् 1937 में उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया। प्रारंभ में वे मद्रास विधानसभा के स्वतंत्र सदस्य के रूप में चुने गए, बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सम्मिलित हो गए। सन् 1946 में वे केंद्र की संविधान सभा के सदस्य चुने गए।

वित्त मंत्री के रूप में योगदान
मई 1952 में उन्होंने वाणिज्य और उद्योग मंत्री के रूप में अपना पहला कार्यकाल प्रारंभ किया। अगस्त 1956 में वे केंद्रीय वित्त मंत्री बने और 1958 तक इस पद पर रहे। सन् 1956 में स्थापित देश की पहली आर्थिक नीति संस्था ‘नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER)’ के वे संस्थापक सदस्यों में से एक थे।
विवाद और इस्तीफ़ा
हरिदास मुंद्रा घोटाले में उनकी भूमिका के कारण 18 फरवरी 1958 को उन्हें वित्त मंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा।टी. टी. कृष्णामाचारी पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तथा तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. कामराज का विशेष विश्वास था। इसी कारण 1962 में कांग्रेस ने उन्हें तिरुचेंदूर निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़वाया और वे निर्विरोध चुने गए।
प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने जून 1962 में उन्हें पुनः मंत्रिमंडल में शामिल किया गया बिना किसी विभाग के। पांच महीने बाद, सहयोगी मंत्री के रूप में उन्हें आर्थिक एवं रक्षा समन्वय मंत्रालय का दायित्व सौंपा गया। देश में तीन बड़े इस्पात संयंत्रों की स्थापना में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा।

संस्थागत निर्माण और विरासत
सितंबर, 1963 में उन्हें वित्त मंत्रालय में वापस लाया गया। 1964 में एक बार फिर से उन्हें वित्त मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया। इस वित्त मंत्री के पद पर वे 1966 में सेवानिवृत्त होने से पहले तक रहे। कृष्णामाचारी का आई.सी.आई.सी.आई., आई.डी.बी.आई. और यू.टी.आई. जैसी वित्तीय संस्थाओं की संस्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिए। वित्त मंत्री के रूप में उन्होंने कई महत्वपूर्ण कर संशोधन लागू करवाए थे। उन्होंने दंडकारण्य, राजस्थान नहर योजना और दामोदर घाटी परियोजना जैसी योजनाओं की रणनीतिकार भी थें। वृद्ध सरकारी कर्मचारियों के परिवारों को लाभ पहुँचाने हेतु 1964 में पारिवारिक पेंशन योजना लाकर, पेंशन योजना का विस्तार किया था।
विपक्षी सांसदों के एक समूह (जिसमें जनसंघ, संयुक्त समाजवादी पार्टी, स्वतंत्र पार्टी तथा डी.एम.के. शामिल थे) ने नवंबर 1965 में राष्ट्रपति डॉ. एस. राधाकृष्णन को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें एक आयोग की स्थापना की मांग की गई, जो कृष्णामाचारी पर लगे पक्षपात के कुछ आरोपों की जांच करे। राज्यसभा में एस.एस.पी. के गौरी मुरारी ने कृष्णामाचारी पर विदेशी दौरों के समय अपने बेटों की कंपनियों के लिए विदेशी कंपनियों के एकमात्र एजेंसी अधिकार प्राप्त करने का आरोप लगाया था।
जब तक पंडित जवाहरलाल नेहरू जीवित रहे, कृष्णामाचारी के लिए राजनीतिक कार्य अपेक्षाकृत सहज रहे। नेहरू का उन पर गहरा विश्वास था। किंतु नेहरू के निधन के बाद, जब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री बने, तो कृष्णामाचारी और प्रधानमंत्री के बीच वैचारिक तथा कार्यगत सामंजस्य धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा। उस समय कृष्णामाचारी भारत के वित्त मंत्री थे और 1966–67 के बजट की तैयारी तथा चौथी पंचवर्षीय योजना के क्रियान्वयन जैसे महत्वपूर्ण दायित्वों से जुड़े हुए थे।
वित्त मंत्री कृष्णामाचारी की अपेक्षा थी कि संसद के शीतकालीन सत्र में प्रधानमंत्री उन पर लगे आरोपों के संबंध में स्पष्ट वक्तव्य देंगे। वे यह भी चाहते थे कि आरोपों की जाँच प्रधानमंत्री स्वयं करें अथवा किसी वरिष्ठ कैबिनेट सहयोगी से करवाई जाए। परंतु प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम. हिदायतुल्ला से अनौपचारिक जाँच कराने का अनुरोध किया। इस घटनाक्रम के बाद 1965 में कृष्णामाचारी ने मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया। उनके इस दूसरे इस्तीफ़े पर अपेक्षाकृत कम सार्वजनिक चर्चा हुई।
कृष्णामाचारी के पौत्र टी.टी. जगन्नाथन ने 17 जून 2018 को द हिंदू बिज़नेसलाइन को दिए गए एक साक्षात्कार में बताया कि उनके दादा की आर्थिक नीतियों का प्रभाव स्वयं उनके द्वारा स्थापित औद्योगिक समूह पर भी पड़ा। विदेशी मुद्रा संकट को देखते हुए कृष्णामाचारी ने उपभोक्ता वस्तुओं के आयात पर कठोर प्रतिबंध लगाए। उन्होंने अपने पुत्र टी.टी. नरसिम्हन के दिल्ली आने और केंद्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क करने पर भी रोक लगा दी थी, ताकि नीतिगत निर्णयों में किसी प्रकार का हित-संघर्ष न हो।
कृष्णामाचारी ने संसद में अपने ऊपर लगे आरोपों का उत्तर स्पष्ट रूप से दिया था। जब विपक्षी सांसदों के एक समूह ने उन आरोपों को पुनः उठाया, तो उन्हें यह आशा थी कि प्रधानमंत्री उनके प्रति सकारात्मक रुख अपनाएँगे। किंतु प्रधानमंत्री शास्त्री ने यह कहते हुए कि “टीटीके के इस कदम से मुझे दुख और पीड़ा होती है”, उनका इस्तीफ़ा स्वीकार कर लिया।
कृष्णामाचारी का त्यागपत्र केवल आंतरिक राजनीति की परिणति नहीं था। उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत पर अपनी अर्थव्यवस्था को उदार बनाने का दबाव बढ़ रहा था। एक प्रमुख समाचार पत्र ने यह टिप्पणी की कि उन्हें प्रधानमंत्री शास्त्री और उनके कुछ मंत्रियों के साथ व्यक्तित्वगत असामंजस्य के कारण पद छोड़ना पड़ा।
टी.टी. कृष्णामाचारी 1952 से 1967 तक संसद के निर्वाचित सदस्य रहे और केंद्रीय मंत्रिमंडल में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत रहे। 1967 में सांसद के रूप में कार्यकाल समाप्त होने के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति से स्वयं को अलग कर लिया और जीवन के अंतिम वर्षों तक अपने अन्य कार्यों में संलग्न रहे। वे कांग्रेस पार्टी की मसौदा समिति के सदस्य भी रहे और भारतीय संविधान निर्माण से गहराई से जुड़े थे।
आधुनिक भारत के आर्थिक और औद्योगिक ढाँचे के निर्माण में कृष्णामाचारी का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
उन्होंने ‘1929–54 के दौरान संसदीय जीवन’ शीर्षक से अपना संस्मरण भी लिखा, जो उनके राजनीतिक और वैचारिक जीवन की महत्वपूर्ण झलक प्रस्तुत करता है।
कृष्णामाचारी के सम्मान में मद्रास संगीत अकादमी में 1955 में एक भव्य सभागार का निर्माण किया गया, जिसमें लगभग 1600 लोगों के बैठने की व्यवस्था है। इस सभागार का नाम ‘टी.टी. कृष्णामाचारी हॉल’ रखा गया। सन् 1974 में उनके निधन के बाद चेन्नई की प्रसिद्ध माउंट रोड का नाम बदलकर ‘टी.टी.के. रोड’ कर दिया गया।
निःसंदेह, टी.टी. कृष्णामाचारी केवल एक राजनेता या वित्त मंत्री नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक भारत की आर्थिक सोच, संस्थागत निर्माण और प्रशासनिक ईमानदारी के प्रतीक थे। उनका जीवन और कार्य भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में सदैव स्मरणीय रहेगा।
✍️डॉ संध्या सिलावट
इंदौर, भारत
wish you best and best
Mass comment blasting: $10 for 100k comments. All from unique blog domains, zero duplicates. I will provide a full report and guarantee Ahrefs picks them up. Email mailto:helloboy1979@gmail.com for payment info.If you received this, you know Ive got the skills.
wish you all the best
每天都在战争,希望2026和平.
A really good blog and me back again.