यह कैसी आज़ादी
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देश की आजादी को आज
पूरे हुए बहत्तर बरस
लेकिन आज भी आधी आबादी
आजादी को रही तरस
मंदिर हो या रेलवे स्टेशन
लगा भिखारियों का तांता
मौलिक सुविधाओं से जिनका
दूर दूर तक नहीं है नाता
दिहाड़ी मजदूरी, आधी तनखाह
काम कर रहे मेहनतकश
हालात देखकर इनके लगता
गुलाम है भारत जस का तस
आरक्षण के नाम पर पा रहे
अयोग्य अज्ञानी लाभ सरकारी
योग्य ज्ञानी भूखों मर रहे
सवर्णता बनी इनकी लाचारी
झूठे आश्वासन की नींव पर
पहन के धोती कुर्ता खादी
विकास की इमारत बना रहे
बोलो यह कैसी आज़ादी
आज़ादी सार्थक तब ही होगी
जब दूर हो सबकी बेबसी
हर व्यक्ति संतुष्ट रहे
हर चेहरे पर हो खुशी
सुस्मिता मिश्रा
साहित्यकार
