हे माँ शारदे

हे माँ शारदे अंतर्मन में बसी है मूरत मनमोहिनी प्रेममयी सूरत हे माँ वीणावादिनी शारदे कृपा कर माँ, आशीष वर दे। शुक्ल पंचमी के पावन तिथि पर आती तू जब इस धरा पर बसंत के बयारों को साथ लाती नए प्रेम की कलियाँ खिलाती बाल वृद्ध में उमंगें भरती नव जीवन का आह्वान करती हे…

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हरफनमौला बंशी

हरफनमौला बंशी बंशी उठ जा! देख सभी उठ गए |सूरज पंक्षी पेड़ पौधे| देख गाय भी रंभा रही | उठ जा तू भी |बंशी को अम्मा परेशान सी झकझोर रही थी| वो चादर को सिर तक ओढ़ कर कमरे की कोने वाली चौकी पर अड़ा सा पड़ा हुआ था | उठ जा रे लड़के…. उठ…

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फ़रिश्ता

फ़रिश्ता सरकारी अस्पताल के बिस्तर पर लेटी हुई सुशीला काफ़ी कमजोर लग रही थी।परन्तु उसकी आँखों में एक अद्भुत चमक थी। वह अपने नवजात शिशु को जो बग़ल के पालने में लेटी थी , उसे ममता से भरी वात्सल्य से एकटक निहार रही थी।उसका पति हरिया उसके पास ही बैठा था।हरिया दिहाडी मज़दूर था। सुशीला…

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वीर स्थली का सिंह नाद

वीर स्थली का सिंह नाद 1 जुलाई, 2016 को भारतीय सेना की एक महत्वपूर्ण पलटन ‘9 पैरा स्पेशल फोर्सेस’ अपना 50वाँ स्थापना दिवस बड़े उत्साह और गर्व के साथ मना रही थी | सेना से सेवा निवृत हुए बहुत से अधिकारी भी सपरिवार इस महाकुम्भ में भाग लेने के लिए देश- देश से आए हुए…

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चलकर देखें

चलकर देखें   इरादा कर ही लिया जब कि चलते जाना है फिर जरूरी है क्या कि अँधेरे को हम डरकर देखें हौसला लेकर चलें हल की तरह कांधे पर जहाँ पर रौशनी का घर है वहाँ चलकर देखें कसैलेपन के लिए जिंदगी ही काफी है ये जरूरी नहीं कि हर बार हम मरकर देखें…

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श्रम शक्ति

श्रम शक्ति मज़दूर हूँ, मजबूर नहीं मेहनत करता हूँ, क़सूर नहीं पेट मेरी भी भरे और सबकी.. फिर कहाँ शिकायत, किसी से हुज़ूर है… मज़दूर हूँ, मजबूर नहीं….. मेहनत करता हूँ, क़सूर नहीं…. भूख से लड़ता, प्यास से लड़ता सर्दी गर्मी और बरसात से लड़ता हालात से लड़ता, ज़ज़्बात से लड़ता लड़ता धूल, मिट्टी और…

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मुंशी प्रेमचंद

मुन्शी प्रेमचंद कथा सम्राट, उपन्यास सम्राट कहानी सम्राट लघु कथा, प्रेमचंद जी की रचनाओं में ग्रामीण परिवेश रहन सहन जीवन शैली देखते ही बनती है उनकी किसी भी कहानी लघु कथा या निबंध आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है उनके किसी एक रचना को रुचि कर बताना बहुत ही मुश्किल कार्य है उनके कहानी…

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तुम मेरे पास हो …हमेशा!

माँ, तुम हो यहीं कहीं,..मेरे आसपास, भींगी पलकें जब यादों का सहारा चाहती हैं, तुम तब भी -मेरे साथ होती हो ..माँ, जैसे मैं तुम्हें छू सकती हूँ, महसूस कर सकती हूँ– ”तुम्हारे कदमों क़ि आहट, जब ये अधर कुछ्फरियाद करते हैं, तो जैसे.. तुम सुनती हो मेरी आवाज, बिन कहे मान लेती हो, मेरी…

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अतिथि एक दिन का

अतिथि एक दिन का अच्छी भली सो रही थी और सपनों में ,पर्वतों के पार दूर कहीं क्षितिज पर सैर कर रही थी कि अचानक ही धीमे से तेज … और भी तेज होती “खट – खट” की आवाज़ ने आराम करती हुई पलकों को जबरदस्ती खोल ही दिया । मैं भी किसी प्रकार उनींदी…

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शब्द सुमन: राष्ट्रकवि के चरणों में

शब्द सुमन: राष्ट्रकवि के चरणों में “मुझे क्या गर्व हो ,अपनी विभा का, चिता का धूलिकण हूँ, क्षार हूँ मैं। पता मेरा तुझे मिट्टी कहेगी, समा जिसमें चुका सौ बार हूँ मैं।” कौन है ऐसा स्वपरिचय देता हुआ? अरे वह तो ,सरस्वती का वरद पुत्र, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ नाम जिसका हुआ। ‘राम’ को धारण करने…

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