भारत का मजबूर मजदूर

भारत के मजबूर मजदूर “चढ़ रही थी धूप, गर्मियों के दिन, दिवा का तमतमाता रूप, उठी झुलसती हुई लू, रूई ज्यों जलती हुई भू, गर्द चिनगीं छा गयी, प्रायः हुई दुपहर, वह तोड़ती पत्थर..” आप सबमें से कुछ लोगों ने महाकवि निराला की यह कविता सुनी होगी और मेरा दावा है जब भी आपने सुनी…

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अरुण धर्मावत की कविताएं 

अरुण धर्मावत की कविताएं    1.शंखनाद   धूमिल धूमिल पथ रह गए लक्ष्य अलक्षित रह गए अंधियारों में जले दीप जो उजियारों को लील गए   शोषित वंचित अपमानों के प्रश्न बिलखते रह गए जो चले योद्धा अग्रपथों पर आज वही पथ भूल गए   व्यथाओं का नित प्रदर्शन शब्द निरर्थक रह गए लिख कर…

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महामारी के दिनों में प्यार !

महामारी के दिनों में प्यार ! कुछ दिनों पहले एक खबर पढ़ी थी कि बिहार के सिवान के एक प्रेमी को मुंगेर में रहने वाली अपनी प्रेमिका याद आई तो वह लॉकडाउन को धत्ता बताते हुए पैदल ही निकल पड़ा मुंगेर की ओर। करीब तीन सौ किमी की पदयात्रा कर वह अपने गंतव्य तक तो…

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बेबाकी और उन्मुक्तता का सशक्त स्वर : ममता कालिया

बेबाकी और उन्मुक्तता का सशक्त स्वर : ममता कालिया कुछ कहानियां श्रृंखलाबद्ध रूप में एक जगह एकत्रित मिली और जब पढ़ना शुरू किया तो पढ़ती ही चली गई । थोड़ा सा प्रगतिशील, अपत्नी, निर्मोही ,परदेशी, पीठ, बड़े दिन की पूर्व सांझ, बीमारी , कामयाब,बोलने वाली औरत ,मेला, आपकी छोटी लड़की इत्यादि-गजब का आकर्षण था कहानियों…

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संकल्प

संकल्प दीपू ज्यादातर विद्यालय में देरी से ही पहुँचता थ। देर से आने वाले बच्चों की अलग लाइन बनवाई जाती है तथा उनका नाम भी उनकी कक्षा के अनुसार लिखा जाता है ताकि उनके कक्षाध्यापक उन्हें जान सकें और समझा सकें ।उस रजिस्टर में नवीं कक्षा में पढ़ने वाले दीपू का नाम एकाध दिन छोड़कर…

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होली जोगीरा

होली जोगीरा आयो है मधुमास, छायो है प्रभास, सुरभित है उपवन, अली करे रसपान, बजाकर बांसुरी सी तान, मैं कैसो करूं बखान, जोगीरा सा रा रा रा…. जोगीरा सा रा रा रा…. पधारे ब्रज में अनंग, देखन को रास रंग, गोपीयन के अंग, थिरकत हैं श्याम संग, हर्षित वृंदावन धाम, मैं कैसो करूं बखान, जोगीरा…

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भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की-भगत सिंह

शहीद भगत सिंह “गुलामी की तोड़ने जंजीर फैला रहे पंछी अब पंख हुकुमरान सजग हो जाओ बजा रहे विश्व भारती अब विजय शंख” -वंदना खुराना इन पंक्तियों से मैं चित्रण करती हूँ उस दौर का, जब हमारे वीर क्रांतिकारियों ने माँ भारती को अंग्रेजी शासनकालों से मुक्त कराया होगा। कुछ इसी तरह का विजय घोष…

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मेरी माँ 

मेरी माँ आज अचानक जब कहा मेरी माँ ने मुझसे लिखो ना मेरे ऊपर भी कोई कविता और फिर ध्यान से देखा मैंने माँ को आज कई दिनों बाद । अरे ! चौंक सी गयी मैं माँ कब बूढ़ी हो गयी ? सौंदर्य से दमकता उनका वो चेहरा जाने कब ढँक गया झुर्रियों से माँ…

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नारी का अस्तित्व

नारी का अस्तित्व हां मैं भी चाहती हूँ अपनी पहचान बनाना! चाहती हूँ अपना अस्तित्व स्थापित करना! ढूंढती हूँ हर गली,हर मोड़ पर! अपने अतीत में, मैं कौन हूँ? मैं कौन हूँ? मैं कौन हूँ…..?? कभी बेटी,,,कभी बहन,… कभी बहु और कभी पत्नी,.. ना जाने कितने नामों से मैं पहचानी जाती हूँ! पर ढूंढती हूँ…

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