न्याय

न्याय क्षितिज पर आषाढ़ के काले मेघ घुमड़ रहे थे. धरती और बादलों का मिलन बिंदु धुआँ धुआँ हो रहा था. बादल थे कि रह रह कर बरसने का उपक्रम कर रहे थे मानों अपना समूचा प्रेम आज ही धरा पर उड़ेल देना चाह रहे हों. ” तनिक देखो तो! कल कितनी तीव्र ग्रीष्म वेदना…

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मुर्दा खामोशी

” मुर्दा खामोशी “ तेरे जग में भीड़ बहुत है आगे बढ़ने की होड़ बहुत है मंज़िल की मुर्दा खामोशी रस्तों का पर शोर बहुत है ख़्वाबों के साये को थामे जीने की घुड़दौड़ बहुत है बुत से दिखते चलते फिरते मरे हुओं की फ़ौज बहुत है पीठों में खंजर…भोंकते प्यार जताते यार बहुत है…

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सैनिक का संदेश

सैनिक का संदेश घर से निकला था, मादरे वतन की हिफाजत में। मेरे इरादे और हौसलों में, जीत का ही जुनून था। ये तो मिट्टी का कर्ज़ था, जो लहु देकर जा रहा हूँ । सौंप कर जा रहा हूँ , ये वतन तेरे हाथ में, ए- मेरे नौजवान साथियों । मैं सरहद देखता हूँ…

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श्वान

श्वान यह एक अलसाई-सी सुबह थी। उधर सुरमई बादलों के पीछे से झाँकता सूरज बाहर आने से कतरा रहा था और इधर मेरा भी रजाई से बाहर निकलने का मन नहीं था। बादलों के पीछे से आती पीली, मंद रोशनी की किरणें नींद को रोकने का असफल प्रयास कर रही थीं। ऐसा लग रहा था…

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सपनों के आगे

सपनों के आगे सफलता या समस्‍या – दोनों एक ही सिक्‍के के दो पहलू हैं शायद। और दोनों ही हमारे कर्मों के फल हैं। कर्म पर निर्भर होता है कि हम खुशियां लाते हैं या फिर और कुछ। कर्म का मतलब है कि अपने आप के लिए तुम ही उत्‍तरदायी हो। कृष्‍ण ने तो अर्जुन…

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शजर

शजर इक पिता सा छाँव करता था शजर कमनिगाही भी वो सहता था शजर । (शजर:वृक्ष कमनिगाही : उपेक्षा) ख़ुद की तो उसने कभी परवाह न की, दूसरों के सुख से सजता था शजर । उसकी बाहों में तसल्ली पाते थे, आसरा पंछी का बनता था शजर । नाच उठता था हवा की ताल पे,…

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इस बार यूँ होली

इस बार यूँ होली कुछ सतरंगी सी चाहत यूँ आज मचल रही है जैसे इस फागुन होली अनकही भी कह रही है मेरी हसरतों को यूँ निखार देना तुम ले सूरज की धूप सूनहरी मेरी गालों पे लगा देना तुम सजा देना माँग मेरी पलाश के सूर्ख लाली से जो चूनर ओढ़ लूँ मैं धानी…

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इस्तीफा

इस्तीफा हिन्दी कथा साहित्य की प्रथम सीढ़ी प्रेमचंद की कहानियों से प्रारम्भ हुई प्रतीत होती है। तीसरी- चौथी कक्षा से प्रेमचन्द की कहानियाँ जैसे’ बूढी काकी ‘, हामिद का चिमटा ‘, नमक का दरोगा आदि से शुरू होते- होते आत्माराम, कफन, इस्तीफा आदि कहानियों के द्वारा’उच्च स्तर की कक्षाओं तक अपनी अमिट छाप छोड़ती चलती…

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सा, रे गा, मा, प…….

सा, रे गा, मा, प……. “गृहस्वामिनी” की संपादिका का आग्रह था कि “महिला दिवस” और उनकी पत्रिका के “महिला विशेषांक” के लिए हम उनको नामित करें जो कि हमें प्रेरित करती हैं, जो कि हरेक परिस्थितियों से जुझारू होकर जीना जानती है। आसपास देखा तो लगा कि हर महिला ही इस सम्मान की अधिकारी है।…

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