“यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते  तत्र देवता”

“यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते  तत्र देवता” नारी के बिना इस सृष्टि की कल्पना करना संभव ही नही है। युवा हो या अधेड़ या हो वृद्ध। सभी पुरुषों को यह समझना जरूरी है। आज छोटी बच्चीयों से लेकर वृद्ध महिलाएं सुरक्षित नही है ,यह 21 वी सदी में रहते हुए भी बड़ी वेदना की बात है।…

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थोथा लाड़ बंदरिया का

थोथा लाड़ बंदरिया का अम्मा रामसखी की दो बहुएं थीं। बड़ी बहू का नाम सरोज और छोटी का नाम कमला था। दोनों बहुएं एक साथ ही गर्भवती हुईं। यह सोच -सोच अम्मा रामसखी का बुरा हाल था कि एक साथ दोनों बहुओं की सोवढ़ का काम कैसे निपटाएंगी। घर का अब एक काम तो होता…

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मंच हमारा विचार आपका

मंच हमारा विचार आपका भारतीय समाज आज शिक्षित ,स्वतंत्र और आधुनिक होने के बाद भी मध्यकालीन युगीन भारतीय समाज की तरह ही महिलाओं के प्रति संकीर्ण एवं विकृत मानसिकता का शिकार है जिसके कारण महिलाओं पर अपराध दिन पर दिन बढ़ता जा रहा है। आज महिलाओं के प्रति अपराध में तेजी से बढ़ोतरी हुई है…

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छठ पर्व

छठ पर्व ये छठ पूजा जरुरी है धर्म के लिए नहीं, अपितु.. हम-आप सभी के लिए जो अपनी जड़ों से कट रहे हैं। अपनी परंपरा, सभ्यता, संस्कृति, परिवार से दूर होते जा रहे हैं। ये छठ जरुरी है उन बेटों के लिए जिनके घर आने का ये बहाना है। ये छठ जरुरी है उस माँ…

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सांझ जिंदगी की

सांझ जिंदगी की जिंदगी सतत परिवर्तनशील है। जन्म लेने से अंत तक, न जाने कितने अंजान रास्तों से चलते, फिसलते, ठोकरें खाते, संभलते हम निरंतर उस राह पर चलते रहते हैं, जिसकी मंजिल का हमें भी पता नहीं होता। जीवन की सांझ ढलने से पहले सोचा न था कि कभी ऐसा मोड़ आएगा, जो मुझे…

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वह अजीब स्त्री

  वह अजीब स्त्री लोग बताते हैं कि जवानी में वह बहुत सुन्दर स्त्री थी। हर कोई पा लेने की जिद के साथ उसके पीछे लगा था। लेकिन शादी उसने एक बहुत साधारण इंसान से की जिसका ना धर्म मेल खाता था, ना कल्चर। वह सुन्दर भी खास नहीं था और कमाता भी खास नहीं…

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मैं और वो

मैं और वो दो इंसान दो वजूद दो व्यक्तित्व अलग परिवेश शहर अलग अजनबी अनजाने बंध गए बंधन में हुए जीवनसाथी बना रिश्ता पवित्र प्यार का इज़हार इकरार एतबार नौनिहाल परिवार जीवनरूपी नैया में हुए सवार हौले हौले गतिशील बहार ही बहार कभी दौड़ी , हवा के रूख के विपरीत कभी बसंती बयार कभी झेलती…

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मैं भूत बनकर आऊँगी

मैं भूत बनकर आऊँगी मैं भूत बनकर आऊँगी सुनो, मैं भूत बनकर आऊँगी ये जो मैं रोज़ तिल-तिल कर मरती हूँ ना उससे मैं थोड़ा-थोड़ा भूत बनती हूँ मुझे यक़ीन है, मैं जल्द ही पूरा मर जाऊँगी मैं जल्द ही पूरा बन जाऊँगी सुनो, मैं भूत बन कर आऊँगी और तुम्हारी गंदी नज़रों की रेखाओं…

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साक्षात्कार

वरिष्ठ कवि एवं शिक्षाविद डा.अरुण सज्जन की षष्ठी पूर्ति के अवसर पर लिया गया साक्षात्कार भगवती चरण वर्मा की काव्य चेतना शोध ग्रंथ, नीड़ से क्षितिज तक, संस्पर्श, उजास जैसे काव्य संग्रह, अक्षरों के इंद्रधनुष निबंध संग्रह जैसी कई पुस्तकों के रचयिता और कला संस्कृति, काव्य पीयूष, रामवृक्ष बेनीपुरी साहित्य अलंकरण सम्मान, बिहार हिंदी साहित्य…

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