अयोध्या

अयोध्या राम लल्ला को उनकी जन्मभूमि मिल गई और भारत को उसका सुकून। खुरच-खुरच के दर्दीली बन गई चमड़ी साफ, सुथरी और सुंदर हो गई। प्रजातंत्र है भई! देर लग सकती है पर काम हो जाता है। ज़मीन के नीचे छुपे तथ्यों को खींच कर ऊपर लाने की ज़रूरत थी। फ़ायदा ये हुआ कि अब…

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एक लड़की थी…

एक लड़की थी… शरारती किस्से वो फ़ोन पर सुनाया करती थी एक लड़की थी मुझे गोद में सुलाया करती थी बिन बाबा के कैसे बीती थीं उसकी माँ की रातें कुछ बेचैनियाँ थीं सिर्फ़ मुझे बताया करती थी डर मेरी उल्फ़त से था, कोई और पसंद था उसे इसी बात पर ज़्यादा खुद को रुलाया…

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कोरोना और सकारात्मकता

कोरोना और सकारात्मकता जीवन है तो सुख-दुःख, आशा-निराशा, ऊँच-नीच, जय-पराजय भी है. सुख-दुःख के घर्षण से ही ज्योति उत्पन्न होती है. जीवन संघर्षों का पर्याय है. कभी महारोगों-महामारी का संघर्ष तो कभी विचारों का, कभी आर्थिक तो कभी पारिवारिक संघर्ष झेलने होते हैं . प्रकृति का नियम है कि कोई भी स्थिति ज्यादा दिन नहीं…

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हम जीतेंगे

हम जीतेंगे हम जीतेंगे, हम जीतेंगे लाज़िम है कि हम ही जीतेंगे वो दिन कि जिसका अरमां है हम सारे जनों का फ़रमां है जब ये भय, ये दहशत का आलम बन इक गुबार उड़ जाएंगे बेशक़ हम दिलों को जोड़ेंगे औऱ ज़ंजीरों को तोड़ेंगे लेकिन, लेकिन……. ना रखे दुश्मन कोई भरम नहीं है मुश्किल…

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होली में

होली में यही हसरत मेरे दिल में रही हर बार होली में, करूं रंगीन गोरी के कभी रुखसार होली में । नहीं हद से गुज़र जाना हदों में मयकशी करना हैं वरना नालियों में गिरने के आसार होली में। चलेंगे दौर गुंजियो के चलेंगे दौर खुशियों के चले आओ हमारे घर हैं हम तैयार होली…

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तुमको हमारी उमर लग जाए

“तुमको हमारी उमर लग जाए” दिन-भर भूखी प्यासी रह रात गए चांद को देख व्रत तोड़ने का नाम है ‘करवा चौथ’। लंबी उम्र पा सकने की धार्मिक घुट्टी पिला पति को आत्मबल प्रदान करने का नजरिया है इसके पीछे। लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है। महिलाएं स्वभाव से ही श्रृंगार प्रिय होती हैं। आभूषणों…

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जीना सिखाया

जीना सिखाया ज्ञान का दीपक कर उजागर शिक्षक आपने जीना सिखाया कभी डांट कर कभी प्यार से जीवनबोध का पाठ पढ़ाया। याद आती है कक्षा मे जब उत्सुक नजरों से घूरते थे सब अनायास व्याख्यान कौशल से तात्विक बातें हमें समझाया। कठिन पाठ को सरल बनाकर रोचक ढंग से प्रस्तुत करते सोचते थे हम, कैसे…

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टिंगू

‘‘टिंगू’’ ‘‘मृदु….. देखो भई कौन है’’ इन्होंने मुझे नीचे के बरामदे से आवाज लगाई. सुबह का अखबार पढ़ते समय तनिक व्यवधान हो तो इनकी आवाज ऐसी ही रूखी हो जाती है. मैं सीढ़ियाँ फाँदती नीचे आई तो देखा कि एक बारह तेरह साल का लड़का साफ धुली हुई हाफ पैंट व टी-शर्ट पहने अपनी माँ…

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नवसृजन

नवसृजन “प्रकृति जैसे बदला ले रही है” टेलीविजन पे उद्घोषिका बारबार यह वाक्य बोले जा रही थी। यह सुनकर नियति सोच में पड़ गई “क्या माँ अपने संतानों से बदला लेती है?” परंतु परिस्थिति ऐसी तो ज़रूर है कि माँ अपने संतानों को मिल रहे कुकर्मों के फल को सकपकाकर, मूकदर्शक बन देख रही है।…

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