Father’s Day

मेरे बाबूजी भोले भाले ,सीधे-साधे, सबसे अच्छे बाबूजी थे । दृढ़ प्रतिज्ञ, उज्जवल चरित्र, कर्म योग के योगी थे। सबसे प्यारे सबसे अच्छे बाबूजी थे। अनुशासित जीवन था उनका। उच्च कोटि के शुद्ध विचार। न्याय सदा करते थे। सबसे प्यारे सबसे अच्छे बाबूजी थे । गहराई से सोच समझ कर कर, बात समय पर करते…

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लॉकडाउन के दौरान

लॉकडाउन के दौरान ( डायरी के कुछ पन्ने ) बचपन में ऐसी फिल्में देखकर जिसमें बच्चे अपने माता -पिता से बिछड़ जाते हैं देखकर बहुत डर लगता था और सोचती थी अगर माता पिता को कुछ होना है तो मुझे भी उनके साथ हो …आज सोचती हूँ मुझे कुछ होना है तो मेरे साथ मेरे…

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माँ तुम बहुत याद आती हो

माँ माँ तुम बहुत याद आती हो जब स्कूल से घर आती हूँ, खाली घर ही पाती हूँ सूनी सी देहरी देखती हूँ, अपनी थाली खुद लगाती हूँ, छोटे को भी कभी ख़िलाती हूँ , हर निवाले के साथ माँ तुम बहुत याद आती हो। आज जब मुझे लगा कि अब मैं भी बड़ी हो…

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श्रम शक्ति

श्रम शक्ति मज़दूर हूँ, मजबूर नहीं मेहनत करता हूँ, क़सूर नहीं पेट मेरी भी भरे और सबकी.. फिर कहाँ शिकायत, किसी से हुज़ूर है… मज़दूर हूँ, मजबूर नहीं….. मेहनत करता हूँ, क़सूर नहीं…. भूख से लड़ता, प्यास से लड़ता सर्दी गर्मी और बरसात से लड़ता हालात से लड़ता, ज़ज़्बात से लड़ता लड़ता धूल, मिट्टी और…

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निर्मला लौटेगी ज़रूर !

निर्मला लौटेगी ज़रूर ! हमारे शहर के इस हिस्से में यह तीन तल्ला,आलीशान पीली कोठी, वास्तुकला की अनुपम मिसाल है. जिसका,काले रंग का, ऊँचा सा भारी भरकम, कटाव-दार मुख्य दार है. लोहे की सर्पाकार सीढ़ियाँ, आबनूस की लकड़ी व रंगीन-सफेद काँच से बनी खिड़कियाँ-दरवाजे, ‘चायनीस-ग्रास’ से सजा कालीन-नुमा उद्यान,विलायती गुलाबों की क्यारियाँ, मुख्य द्वार पर…

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शहीद-ए-आजम

शहीद-ए-आजम ” वेदना में एक शक्ति है, जो दृष्टि देती है। जो यातना में है, वह द्रष्टा हो सकता है।”- यह अज्ञेय द्वारा रचित “शेखर एक जीवनी- भाग एक” पुस्तक की पहली पंक्ति है। सत्य है, वेदना मनुष्य को अन्याय का प्रतिकार करना, उसके विरुद्ध मोर्चा लेना और कभी -कभी जान की कीमत लगा कर…

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अच्छा लगता है

अच्छा लगता है सुनो न , बहुत दिन से कुछ कहना है तुमसे! पर उस बात का ज़ायका मुँह में घुलता है कुछ इस तरह, वो बात कह ही नहीं पाती । सुनो तो….. तुम अच्छे लगते हो अब ये मत पूछना क्यों : इन फैक्ट मेरी बात पूरी होने दो पहले फिर कुछ भी…

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मैं आप की बेटी हूँ

मैं आपकी बेटी हूँ मैं उन सब बेटियों की तरफ से लिख रही हूँ जिन्हें अपनी बात रखने का कभी मौका नहीं मिला। कभी संकोचवश, कभी आदतन। घर की दहलीज के भीतर रहने वाली बेटियाँ, कदमताल पर आगे चलने वाली बेटियाँ — कुछ व्यथाएँ अनकही रह गई। लेकिन बाबा, अब्बू, बाबू जी, पापा की लाड़ली…

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