भाग्यरेखा ने उकेरा

भाग्यरेखा ने उकेरा भाग्य रेखा ने उकेरा स्वप्न रेशम रूप तेरा ले रहा आकार अंतर में सलोना रूप तेरा।। मांगती रहती विधाता से सुमन रस राग भीगे। दे रहा प्रारब्ध ही यूं हो सदय उपहार मेरा।। पलक के आह्लाद पर है वाणियों का मूक पहरा। खिलखिलाती आ गयीं खुशियां, ह्रदय का मार फेरा।। अधर कोपल…

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यू आर माय वैलेंटाइन

यू आर माय वैलेंटाइन  मैं और तुम दो अलग अलग चेहरे दिल शरीर जान आत्मा व्यक्तित्व परिवार दोस्त वातावरण फिर भी हम ऐसे एक दूसरे मे यूं समाहित हुए मेरा सब कुछ हुआ तेरा तेरा सब कुछ हुआ मेरा तेरा मान सम्मान स्वभिमान सुख दुःख सफलता धन सम्पत्ति परिवार जिम्मेदारी हुई मेरी और मेरी हुई…

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मेरा चाँद

मेरा चाँद आज है करवा चौथ की रात कितनी मदमाती ये रात है हर साल होता है मुझे चौथ के चाँद का इन्तज़ार छलनी से होता है साजन का बड़ी अदा से दीदार आसमान पर है चौथ का चाँद मुझको उसमें मेरा प्यारा पिया बस तू ही तू नजर आता है। करुँ मैं आज सोलह…

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एक दूजे के लिए

प्र.-  शादी के बाद कितनी बदली आप लोगों की जिंदगी???  उ.- शादी के बाद कुछ परिवर्तन आतें तो है परंतु हम दोनों एक दूसरे से पहले से परिचित थे और परिवार भी बहुत अच्छा और प्रेम करने वाला रहा इसलिये ज्यादा मुश्किलें नही आयी। दोनों ही परिवारों में मैं सबसे छोटी थी इसलिये मुझपर किसी…

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विकास का प्रयास 

  विकास का प्रयास कॉग्रेस के 65 साल सरकार के बाद भी देश बेरोजगारी, गरीबी, अशिक्षा और कुपोषण से ग्रस्त था देश। लेकिन हमारी सरकार जब से आई ,बेरोजगारी दूर करने के लिए स्टार्टअप इंडिया, मुद्रा लोन योजना, कौशल विकास जैसे योजनाओं को लागू कर युवाओं को प्रशिक्षित कर स्वयं रोजगार पैदा कर बेरोजगारी दूर…

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दिव्या माथुर: मेमेन्तो मोरी

दिव्या माथुर: मेमेन्तो मोरी ब्रिटेन में रहने वाली प्रवासी भारतीय हिन्दी लेखक सुश्री दिव्या माथुर से हमारी पहली मुलाक़ात सितम्बर 1999 में हुई थी, जब मैं मास्को विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रोफ़ेसर बोरिस जाखारयिन के साथ छठे विश्व हिन्दी सम्मेलन में भाग लेने के लिए लन्दन गई थी। दिव्या जी ने बड़ी हार्दिकता के साथ…

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अरमान

अरमान वो इंजीनियर थी, घर वालों ने कभी पढ़ने से मना नहीं किया। और वह मैट्रिक पास। वो अंग्रेजी बोल – पढ़ – लिख लेती थी और वह केवल टूटी-फूटी हिन्दी और तेलगू बोल लेता था। वो बिजनेस समझती थी, कहाँ क्या बोलना है, किससे क्‍या फायदा हो सकता है। वह सीधा था, सब पर…

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तामील

तामील   हुक्मे नज़रबंदी है ये फ़रमाया आला पीर ने तू बहुत नाचीज़ बन्दे तू हुक्म की तामील कर   वक्त की पाबंदगी का है यह फ़रमान प्यारे तू बहुत ख़ुदगर्ज़ बन्दे फरमां यह क़बूल कर   तू रहेगा आज से पिंजरे में ज्यूँ पंछी कोई तू बहुत आज़ाद बन्दे पिंजरे से ना परहेज़ कर…

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जय माँ सरस्वती

जय माँ सरस्वती क्या लिखूँ , कैसे लिख दूँ वो भाव कहाँ से लाऊँ रच दूँ माँ तुझ पे कविता वो शब्दार्थ कहाँ से लाऊँ … भटक रही जग की तृष्णा में मोह माया का भंवर सा फैला अंतर्मन को निश्छल कर लूँ वो परमार्थ.. कहाँ से लाऊँ … निज स्वार्थ भरा औ द्वेष भरा…

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