अप्प दीपो भव

अप्प दीपो भव     “दीदी मोबाइल में खुशबू कार्ड भेजी है जरूर आइएगा।” चाय का कप मुझे थमा कर और अपनी चाय लेकर मचिया पर बैठते हुए अनीता ने पहले बात यही कही। मैंने झट मोबाइल खोला और व्हाट्सएप पर ‘खुशबू बुटीक’ पढ़ते ही समझ गई कि खुशबू ने एक बुटीक खोला है। “चलो…

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माँ.. ममत्व और मातृत्व

माँ.. ममत्व और मातृत्व परमपिता ने हर रूह में बसाया मातृत्व भाव… अहो, पर जगत में आज बंधु ममता का देखो कैसा है अभाव.. कि मानव मानव के ही खून का बन बैठा है प्यासा देखो देखो तो जाकर के पाओगे हर मां का कलेजा दिन रात है फटता, आत्मा से निकलती चित्कार, आह चेहरा…

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माँ! अब मैं जान गई हूँ

माँ! अब मैं जान गई हूँ नन्ही-सी मुन्नी उम्र में छोटी है तो क्या हुआ चौदह-पंद्रह साल की छोटी-सी उम्र में उसको प्यार,लड़ाई और गालीगलौज़ सब समझ आता है। दिल्ली की एक गन्दी बस्ती में छोटी-सी खोली है उनकी। उस खोली में रहने वाले पांच प्राणी, माँ-बाबा,मुन्नी और उसके दो छोटे भाई नंदू और छोटू|…

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जाले

जाले “अरे! धीरे…धीरे।” “हाँ, धीरे ही चल रही हूँ,” चमाचम चमकते टाइल्स की फर्श पर फिसल-फिसल जा रहे थे स्तुति के पैर। मोहित ने उसको कंधों से थाम लिया। “एकदम घबराना नहीं है मिनी।…सिस्टर! डॉ. अमला कितने बजे तक….?” “बस पंद्रह मिनट बाद।” संक्षिप्त उत्तर! रिसेप्शनिस्ट बिजी। बारी-बारी से बजते कॉल को रिसीव करती रिसेप्शनिस्ट…

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माँ तू अनमोल है

माँ तू अनमोल है न जाने कितनी ही बार लड़खडाते कदमो को संभाली होगी माँ न जाने कितनी ही बार गिरने से बचाई होगी माँ न जाने कितनी ही बार गोद में लेकर थपकी दी होगी माँ न जाने कितनी ही बार कितने जतन की होगी मेरी हंसी खुशी के लिए माँ न जाने कितनी…

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दसवें दिन ‘माँ दुर्गा’ क्यों नहीं ??

दसवें दिन ‘माँ दुर्गा’ क्यों नहीं ?? हर बार नवरात्र समाप्त होते ही दसवें दिन ‘श्रीराम’ एक नायक के रूप में उभरकर सामने आते हैं, और ‘रावण’ खलनायक के रूप में पेश किया जाता है। विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में भी देखा जाता है। मैंने शायद एक-दो बार ही रावण…

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निःस्वार्थ प्रेम की दास्तान है वैलेंटाइन

निःस्वार्थ प्रेम की दास्तान है वैलेंटाइन ये कटु सत्य है कि प्रेम मानवीय वृत्तियों का दिव्यतम रूप है।प्रेम पाषाण ह्रदय को भी पिघलाकर सरस बना देता है उसके अभाव में सब कुछ नीरस लगता है।जिस ह्रदय में प्रेम का संचार हो जाता है उसका मन मयूर की भांति नाचने लगता है।वाक़ई प्रेम एक अछूता एहसास…

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इस्तीफा

इस्तीफा हिन्दी कथा साहित्य की प्रथम सीढ़ी प्रेमचंद की कहानियों से प्रारम्भ हुई प्रतीत होती है। तीसरी- चौथी कक्षा से प्रेमचन्द की कहानियाँ जैसे’ बूढी काकी ‘, हामिद का चिमटा ‘, नमक का दरोगा आदि से शुरू होते- होते आत्माराम, कफन, इस्तीफा आदि कहानियों के द्वारा’उच्च स्तर की कक्षाओं तक अपनी अमिट छाप छोड़ती चलती…

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