मैं बोल रही हूँ

मैं बोल रही हूँ शाम के तीन बज चुके थे। सेमिनार खत्‍म होने में एक घंटा और था। स्‍मृति सामने बैठकर सुन रही थी। कमरे में अच्‍छी खासी भीड़ थी। ज्‍यादातर अभी अभी कॉलेज से निकले युवा थे। इस सेमिनार में डॉ.. त्‍यागी, मधुसूदन गुलाटी भाई अग्रवाल और न जाने कितने नामी गिरामी लोग थे।…

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औरत ,औरत की दुश्मन

प्रायः यह जुमला सुनने को मिल ही जाता है जब कभी किसी औरत को दूसरी औरत द्वारा प्रताड़ित या परेशान किया जाता है। काफ़ी लोगों का यह मानना है कि अधिकतर औरत ही औरत की परेशानी का कारण होती है। यदि हम आस – पास नज़र डालें और औरतों के प्रति हो रहे अपराधों के…

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भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की- सुभद्रा कुमारी चौहान

अग्रणी महानायिका “हिंदी साहित्य हमेशा समाज से सम्बद्ध रहा है। साहित्य मात्र मनोरंजन का माध्यम नहीं वरन सामाजिक समस्याओं और विसंगतियों का आईना भी है।” आधुनिक हिंदी साहित्य के क्षेत्र में शुरुआत से ही देश की स्वतंत्रता की आवश्यकता और गुलामी की विवशता पर लेखकों ने खुल कर कलम चलाया था।भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर आज…

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माँ एक किरदार अनेक

माँ एक किरदार अनेक मित्र, संबन्धी विपदा में हमारे साथ होते हैं….. लेकिन माँ विपदा में साथ नहीं सामने होती है, संकट मोचन सी होती है “माँ”… बच्चों के अनकहे दर्द को सुन लेती है…. माँ के स्पर्श मात्र से दूर होने लगती है, शरीर के सारे रोग,दोष अपने बच्चों के लिए, सबसे बड़ी वैद्य…

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वसंत की नायिका

वसंत की नायिका वह कहता है कि उसकी हसरतें अक्सर लज़्ज़ित हो जाती है जब ह्र्दयरूपी मंच में उसके प्रेम या इश्क़ को एक मर्यादित स्थान देने की बात करती हूँ।सिर्फ़ इतना कह की तुम्हारी सौम्यता कोई भी परिधि नही लाँघ सकती। उसकी पहले से ही सिकुड़ी आँखे थोड़ा और संकुचित हो जाती है मेरी…

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कैसे दिन फिरते जाते हैं

कैसे दिन फिरते जाते हैं कैसे दिन फिरते जाते हैं मास दिवस लगते पर्वत से, उलझन नित बनते जाते हैं कैसे दिन फिरते जाते हैं। बाग बगीचे घूमने के दिन छोटी अमिया लाने के दिन कूक पपीहा बौराते हैं कैसे दिन फिरते जाते हैं। चैता फागुन खा गया कहर यह फैल गया है शहर-शहर सपने…

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ओह, पुरुष क्या तुम नहीं जानते?

ओह,पुरुष “ओह, पुरुष क्या तुम नहीं जानते?” ओह, पुरुष क्या तुम सुनते नहीं हो, तुम्हारी पत्नी कई आँसू रो रही है! ओह, पुरुष क्या तुम देखते नहीं हो तुम्हारी पत्नी कई डर छुपा रही है! ओह, पुरुष क्या तुम्हें महसूस नहीं हो रहा तुम्हारी  पत्नी सुरक्षा के लिए तरस रही है! ओह, पुरुष क्या तुम्हें…

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मां की ममता

मां की ममता माँ मेरी माँ तूँ ममता की मूरत है, निश्छल और प्यारी हसीं तेरी सूरत है, वो एहसास आज भी मेरे पास है….. जब तूँ मुझे हर पल अपने आँचल में ही छुपा कर रखना चाहती थी, क्यूंकि तुम्हे डर था की किसी की नज़र न लग जाये मुझे,… मैं बड़ी हो गयी…

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मेरा प्रणय निवेदन

मेरा प्रणय निवेदन सुनो,, आज फिर से तुम्हें प्रपोज करने को जी चाहता है। मेरा बजट थोड़ा कम है, शालिटेयर नहीं है मेरे पास, दुर्गा माँ की पिण्डी से उठाए गंगाजल से भीगे, कुछ सूर्ख लाल अड़हुल के फूल हैं। तुम स्वीकार तो करोगे ना? मेरा प्रणय प्रणय निवेदन,,, तुम पदाधिकारियों का क्या भरोसा? हमारा…

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साथी हाथ बढ़ाना !

साथी हाथ बढ़ाना ! श्रमिक हमारी सभ्यता-संस्कृति के निर्माता भी हैं और वाहक भी। हजारों सालों तक मनुवादी संस्कृति ने उन्हें वर्ण-व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर रखा। उन्हें शूद्र, दास और अछूत घोषित कर उनके श्रम को तिरस्कृत करने की कोशिश की गई। सामंती व्यवस्था ने गुलाम और बंधुआ बनाकर उनकी मेहनत का शोषण…

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