वीरांगना बीना दास

वीरांगना बीना दास आज से ठीक 88 वर्ष पूर्व 6 फरवरी 1932 का दिन था, जब कलकत्ता विश्वविद्यालय के कनवोकेशन हाल में बैठे सैकड़ों लोग एक युवती द्वारा लगातार चलायी जा रही गोलियों से स्तब्ध रह गए, जिनका निशाना कोई और नहीं बल्कि बंगाल का तत्कालीन गवर्नर स्टेनले जैक्सन था। हालाँकि जैक्सन बच गया पर…

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महिला दिवस : पिंजड़े से उड़ान

महिला दिवस : पिंजड़े से उड़ान महिला और पुरुष – यही दो शाश्वत जातियाँ हैं। और एक अनवरत संघर्ष चलता रहता है दोनों के बीच, आर या पार की लड़ाई भी। शायद, जब मानव जीवन कदराओं में जी रहा था, तभी बंटवारा हो गया था – बाहर के काम, जंगली जानवरों के शिकार, आग जलाना…

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भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की- सुभाषचंद्र बोस

स्वतंत्रता संग्राम के अविस्मरणीय योद्धा :नेताजी सुभाष चंद्र बोस जब हम आजादी की लड़ाई के माध्यम से स्वतंत्र भारत का सपना देख रहे थे, उस समय हमारे बीच एक ऐसा शख्स था , जो स्वयं में पूर्णतः आश्वस्त था कि आजादी तो हमें मिलेगी। उसके लिए हर्जाना भी भुगतना पड़ेगा । लेकिन आजादी को मिलने…

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शहीद-ए-आजम

शहीद-ए-आजम ” वेदना में एक शक्ति है, जो दृष्टि देती है। जो यातना में है, वह द्रष्टा हो सकता है।”- यह अज्ञेय द्वारा रचित “शेखर एक जीवनी- भाग एक” पुस्तक की पहली पंक्ति है। सत्य है, वेदना मनुष्य को अन्याय का प्रतिकार करना, उसके विरुद्ध मोर्चा लेना और कभी -कभी जान की कीमत लगा कर…

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टिंगू

‘‘टिंगू’’ ‘‘मृदु….. देखो भई कौन है’’ इन्होंने मुझे नीचे के बरामदे से आवाज लगाई. सुबह का अखबार पढ़ते समय तनिक व्यवधान हो तो इनकी आवाज ऐसी ही रूखी हो जाती है. मैं सीढ़ियाँ फाँदती नीचे आई तो देखा कि एक बारह तेरह साल का लड़का साफ धुली हुई हाफ पैंट व टी-शर्ट पहने अपनी माँ…

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गीता जयंती

गीता जयंती गीता जयंती के शुभ अवसर पर आयोजित भगवत् गीता के श्लोकों का चिंतन-मनन यह एक सार्थक पहल है, यह उपक्रम सतत चलता रहे तो सभी को बौद्धिक और आध्यात्मिक लाभ होगा । आज मैं “अवतारवाद” पर अपनी अल्प बुद्धि से कुछ विचार व्यक्त कर करना चाहती हूं । अवतार का अर्थ स्वयं परमात्मा…

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अनुत्तरित प्रश्न

अनुत्तरित प्रश्न एक बार फिर… नहीं..नहीं.. इस बार आने दो मुझे। .. क्यों नहीं आने देती हो… मैं आना चाहता हूँ… नहीं वह सब नहीं होगा जिसका तुम्हें भय है… तुम बहुत अच्छी हो। .. वह भी बहुत समझदार है… देखा नहीं उसने अपनी जिम्मेदारियां कितनी खूबसूरती से निभाईं हैं… … माना उसका विश्वास उठ…

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एक निमंत्रण मानसून को

एक निमंत्रण मानसून को आसमान मे तक, श्याम बादलोँ को, दे दिया उन्हें नेह निमंत्रण। आ मानसून आ, बहा ले जा अपने साथ, पिशाचिनी कोरोना को। जिसने कितनी माँओं से उनके बच्चें छीने, और कितने बच्चों से छिना, उनके पिता का दुलार। जिसके कुचक्र में फँसकर कराह रही हेै आदमजात। आ मानसून आ, बहा ले…

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देह से इतर स्त्री ……….!!

देह से इतर स्त्री ……….!! एंगेल्स ने कहा है कि मातृसत्ता से पितृसत्तात्मक समाज का अवतरण वास्तव में स्त्री जाति की सबसे बड़ी हार है। मानविकीविज्ञान शास्त्र (Anthropology) के विचारक ‘लेविस्त्रास’ ने आदिम समाज का अध्ययन करने के बाद कहा-‘सत्ता चाहे सार्वजनिक हो या सामाजिक, वह हमेशा पुरुष के हाथ में रही है। स्त्री हमेशा…

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काश यूँ भी कभी

काश….. यूँ भी कभी सोचती हूँ काश मैं भी सांता बन पाती । हर जीवन में प्रेम अमृत की गंगा मैं बहाती । रोतें बच्चों के आँखों से सारे आसूँ छीन लाती उनके कोमल अधरों पर गीत बन गुनगुनाती।। जीनव धूप में थके किसान पिता की चिंता मैं मिटाती धरती माँ की आँखों से दर्द…

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