भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की-रानी लक्ष्मीबाई

मेरी महानायिका-झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बुंदेलों हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वी तो झाँसी वाली रानी थी। आदरणीया स्वर्गीया सुभद्राकुमारी जी की रचना रानी लक्ष्मीबाई के साथ इतिहास में अंकित हो गई। यह काव्य कथा एक दर्पण की भाँति रानी जी की जीवनगाथा को अक्षरशः प्रतिबिंबित करती है। कविता पढ़ते…

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गांधी जी एक समाज सुधारक के रूप में

गांधी जी एक समाज सुधारक के रूप में कोई इंसान महान पैदा नहीं होता,उसके विचार उसे महान बनाते हैं!विचार और कार्य की शुद्धता और सरलता ही महान लोगों को साधारण लोगों से अलग करती है, वे वही काम करते हैं जो दूसरे करते हैं मगर उनका लक्ष्य समाज में बदलाव लाना होता है! राष्ट्रपिता महात्मा…

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वीरांगना आजीजन बाई

वीरांगना आजीजन बाई आजादी की चेतना मनुष्य की मौलिक प्रवृत्ति है । स्वतंत्रता की पहली लड़ाईअट्ठारह सौ सत्तावन मे भाग लेने वाले असंख्य लोगो, किसानों, मजदूरों, फौजियों और सेनानायको के साथ ऐसे पेशे से जुड़े लोग, जिन्हें समाज में बहुत सम्मान जनक नहीं माना जाता है ,के भी सम्मिलित होने और आजादी की बलिवेदी पर…

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ठाकुर का कुआंँ–प्रेमचंद

ठाकुर का कुआंँ–प्रेमचंद मुझे प्रेमचंद की लिखी यह कहानी ‘ठाकुर का कुआँ’ अत्यंत पसंद है।इस कहानी में अछूत संदर्भ को ही संस्पर्श करती है तथा ऊँच-नीच के भेदभाव को बड़ी ही बारीकी के साथ प्रस्तुत किया गया है। हम सब जानते हैं कि प्रेमचंद आधुनिक युग के एक महत्वपूर्ण लेखक हैं जिन्होंने दलित समस्याओं पर…

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बड़े लोकेर बेटी लोग

बड़े लोकेर बेटी लोग यह बहुत पुरानी बात नहीं है। एक शहर में एक व्यापारी परिवार था। धन दौलत, ऐशो–आराम की कोई कमी नहीं थी। दूसरे विश्व युद्ध के समय कपड़ों के व्यापार में अच्छी आमदनी हुई। पूरे शहर में एक ही कोठी थी-पीली कोठी। घर के सामने बगीचा, शेरों वाली मूर्ति और संगमरमर का…

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मुर्दा खामोशी

” मुर्दा खामोशी “ तेरे जग में भीड़ बहुत है आगे बढ़ने की होड़ बहुत है मंज़िल की मुर्दा खामोशी रस्तों का पर शोर बहुत है ख़्वाबों के साये को थामे जीने की घुड़दौड़ बहुत है बुत से दिखते चलते फिरते मरे हुओं की फ़ौज बहुत है पीठों में खंजर…भोंकते प्यार जताते यार बहुत है…

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माँ! अब मैं जान गई हूँ

माँ! अब मैं जान गई हूँ नन्ही-सी मुन्नी उम्र में छोटी है तो क्या हुआ चौदह-पंद्रह साल की छोटी-सी उम्र में उसको प्यार,लड़ाई और गालीगलौज़ सब समझ आता है। दिल्ली की एक गन्दी बस्ती में छोटी-सी खोली है उनकी। उस खोली में रहने वाले पांच प्राणी, माँ-बाबा,मुन्नी और उसके दो छोटे भाई नंदू और छोटू|…

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माँ तो बस माँ ही होती है

माँ तो बस माँ ही होती है आज भी याद है माँ की वह तस्वीर बचपन में ,स्कूल जाते समय टीफिन लेकर पीछे दौड़ती माँ स्कूल से आते ही खाना खिलाने के लिए घंटों मशक्कत करती माँ लुकछिपी के खेल में जानबूझ कर शिकस्त खाती माँ मेरी चिंता में हर पल अपने आपको जलाती माँ…

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कस्तूरबा गाँधी से एक काल्पनिक मुलाकात

कस्तूरबा गाँधी से एक काल्पनिक मुलाकात खट्दर की साड़ी, ढँका हुआ सिर, माथे पर गोल बिंदी, कलाई में सादी चूडियाँ – इस छोटी दुबली — पतली महिला को देखकर विश्वास ही नहीं हुआ कि उसमें कितनी शक्ति समाहित है। उसकी उपस्थिति से ही कमरा जैसे जीवंत हो गया। कमरा खचाखच भरा हुआ है। सबके मन…

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