अरुण कुमार जैन की कविताएं 

अरुण कुमार जैन की कविताएं  प्रकृति के साथ पत्थरों और पहाड़ों से कौन सर फोड़ना चाहता है बस पहाड़ों के नाम से हर कोई मुंह मोड़ना चाहता है मगर कभी देखो जाकर उन पहाड़ों की तस्वीर समझो कभी उनकी तासीर मौसम बदलते रंग और नजारे पहाड़ों के साए में बहती नदी उनके ऊपर से बहते…

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घर में भेड़िये

घर में भेड़िये   रात भर इमली दर्द से कराहती रही,पोर पोर फोड़े की तरह पिरा रहा था।उसे जानवरों की तरह पीटा गया।कसूर—नारी निकेतन की संचालिका के पति को उसने चाँटा मारा। उसकी हवस की टपकती लार के विरोध में —- “माई,हमको ये बापू बहुत मारता है,चिमटी काटता है,उसकी बात न माने तो हाथ मरोड़ता…

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करवा चौथ का चाँद आया

करवा चौथ का चाँद आया देख सखी दूर हुआ तमस मन कमल खिला उद्गार संग घिरी थी कालिमा चहुँ ओर नभ दमके सखी चाँद आया खिल रहा था चाँद हर माह निराशा भय का जैसा प्रहर अद्भुत ज्योति है हटा धुंध करवा चौथ का चाँद आया चाँदनी की ओढ़नी लहराते नयन खिले स्निग्ध मुस्कान अमृत…

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“पसरते शहर ……….….. सिकुड़ते लोग” !!

  “पसरते शहर ……….….. सिकुड़ते लोग” !! सुविधाएं जब सनक और रुतबे का रुप ले लेती है, तो दबे पांव जिंदगी में घुन लगना शुरू हो जाता है। कभी शहर का मतलब सुख-सुविधाओं और बेहतर जीवन रहा होगा, पर आज शहरों की हालत देखते हुए ऐसा बिल्कुल नहीं नजर आता। अब हर कोई शहरों की…

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रजनीगंधा

रजनीगंधा कल सांझ का दिया जलाने गई थी तुलसी तले घर के आंगन में, तभी मस्त हवा के झोंके ने बिखेर दी रजनीगंधा की सुगंध पूरे आंगन में। वो रजनीगंधा जिसे तुमने बड़े प्यार से लगाया था हमारे आंगन में, और कहा था, “प्रिये गुजारेंगे गर्मियों की रातें इस प्यारे से आंगन में”। पर, तुम्हें…

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BASANT

BASANT (Spring)   Flowers during winter, Hide in earth’s cosy bed, Eager in summer for rebirth, Lifting their beautiful heads. Leaves and flowers, Just wait for the dark, wintry nights to go, And long bright sunny days to grow. Soon you see, in the months of, March April and May, Hazy mist and fog driven…

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ऑटिज्म डे

ऑटिज्म डे दो अप्रैल दिवस बना है खास, ऑटिज्म दूर करने का ले मन में विश्वास, चले सभी आज ऑटिज्म डे मनाने, कि मन में हो जगे ऐसे पीड़ितों के लिए एहसास। है ऑटिज्म एक बुरी मानसिक बीमारी, जिसके कारण दिखती है पीड़ित के मन में लाचारी, होती मानसिक विकास की गति धीमी, नन्हें बच्चों…

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श्वान

श्वान यह एक अलसाई-सी सुबह थी। उधर सुरमई बादलों के पीछे से झाँकता सूरज बाहर आने से कतरा रहा था और इधर मेरा भी रजाई से बाहर निकलने का मन नहीं था। बादलों के पीछे से आती पीली, मंद रोशनी की किरणें नींद को रोकने का असफल प्रयास कर रही थीं। ऐसा लग रहा था…

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Anthea

Anthea You cut an olive branch you called it life. You knit wreaths of hope and hung them on our collapsed walls. You cried for the lost dreams and prayed so as not to be lost, to be transformed into a source of resurgence. You are tired to look at doubtful shadows on the horizon….

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