“रामधारी सिंह “दिनकर”की काव्यगत विशेषताएँ”

“रामधारी सिंह “दिनकर”की काव्यगत विशेषताएँ” स्वतंत्रता से पहले एक विद्रोही कवि और स्वतंत्रता के उपरांत एक राष्ट्रकवि के रूप में स्थापित माने जाने वाले रामधारी सिंह ‘दिनकर’ हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, लेखक और निबंधकार हैं।जहाँ उनकी कविताएँ वीर रस, ओज, क्रांति और विद्रोह के स्वरों से भरी हैं, वहीं उनके काव्य में श्रृंगार,सौंदर्य और…

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गैंग्रीन

गैंग्रीन सौम्या और केशवी – कॉलेज की दो घनिष्ट सहेलियां विवाह के करीब बीस वर्षों पश्चात एक दूसरे से टकरायीं । गले मिलीं, बड़ी खुश हुईं , अलग अलग शहरों में रहने की वजह से इतने वर्षों में मिलना ही नहीं हुआ । आज इतने वर्षों बाद अचानक मॉल में टकरा गयीं..दोनों ही चालीस पार…

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आया है मौसम प्यार का

आया है मौसम प्यार का   हरे-भरे पहाड़ों पर बर्फ का गिरना नदी का कल-कल प्रवाह चिड़ियों का चहचहाना सरसों की बालियों का खेत में इठलाना आम में मंजरियों का आना गेहूं और ज्वार का पकना रंग-बिरंगे फूलों से धरा का सजना तितलियों का मंडराना भौरों का गुनगुनाना मंद- मंद बहती बासंती बयार का गीत…

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ऐसी कोई रात कहाँ

ऐसी कोई रात कहाँ ऐसी कोई रात कहाँ है, जिसकी कोख से सुबह ना निकले ! दुख का सीना चीर के सुख का सूरज तो हर हाल में निकले ! ऐसा कोई दर्द कहाँ है, जिससे कोई गीत ना निकले ! ऐसी कोई बात कहाँ है जिससे कोई बात ना निकले ! कहाँ कभी एक…

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एक थी कल्ली

एक थी कल्ली   तूने आज फिर मुझे रुला दिया कल्ली। अपनी पच्चीस बरस की नौकरी में तेरी जैसी न जाने कितनी छोरियां इस बाल सुधार गृह में आई और चली गई। लेकिन तूने तो पहले दिन से ही …. ऐसा किया जिसे कोई नहीं भूल सकता। चोरी चकारी, मारपीट, हुल्लड़बाजी, गाली गलौच और फिर…

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हिंदी है हम

हिंदी है हम हिंदी को प्रायः भाषा मात्र समझने की भूल न जाने हम क्यों कर लेते हैं जबकि हिंदी तो भारत की चिंतन धारा का मूल है । इस बात से सभी सहमत हैं जो लोग अपनी मातृभाषा और मातृभूमि को यथोचित सम्मान नहीं देते उन्हें जीवन में पर्याप्त परिश्रम करने के बाद भी…

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बदलाव

बदलाव दीदी अस्पताल से घर आ गई हैं …चार कंधों पर सवार ..घर की दहलीज से कमरे तक का सफर भारी हो रहा है ,…कमरे का सन्नाटा अचानक महिलाओं .बच्चों के रुदन से गूंज उठा ,–आज घर की मालकिन .लक्ष्मी –चली गई ..पर अपने पीछे यादों का एक लम्बा काफिला छोड़ कर …घर -आंगन में…

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बेटी

बेटी बेटे बेटी के मसलों ‌को,कब तक उलझाओगे प्यारे रिश्तों को कब तक भरमाओगे। अनमोल हैं माता पिता ‌के दोनों समाज,कब तक भ्रम फैलाओगे। श्री रूप धर आई बेटियाँ सरस्वती बन पधारी बेटियाँ अपनी उपस्थिति से घर को महकाती हैं जानकी की अवतार हैं बेटियाँ। संस्कृतियों का संगम हैं ये संस्कारों की धरोहर हैं ये…

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मिटेगा कोरोना

मिटेगा कोरोना कैसी हाहाकार मची है कैसा कहर ये ढाया है। पूरी दुनियाँ त्रस्त हुई कोरोना ने दहलाया है। अपने अपने घर में रहना बाहर नहीं निकलना है। जंग शुरू महामारी से है देश से बाहर करना है। दुश्मन ये कमज़ोर नहीं है मानवता का घातक है। जात पांत से दूर ये वायरस इंसानों का…

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