शुभेच्छा

शुभेच्छा संप्रेषित कीजै सब अभिव्यंजनाएं साकार होवें सब मधुर कल्पनाएं खंडित हो जाएं कलुषित वर्जनाएं नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं ।। पल्लवित हों सम्यक संकल्पनाएं झेलनी न पड़े कभी अवहेलनाएं स्पर्श करे नहीं आपको प्रवंचनाएं नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं ।। कलम से निर्गत हों अधिसूचनाएं नाम से जारी हों कई परियोजनाएं संयमित वाणी त्यागे…

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हमारी त्वचा

हमारी त्वचा स्वस्थ एवं सुंदर त्वचा, निखरा हुआ रंग हरेक की चाहत होती है। आइए पहले जानते हैं कि आखिर यह त्वचा है क्या? त्वचा शरीर का वाह्य आवरण है जिसे एपिडर्मिस भी कहते हैं। यह शरीर प्रणाली का सबसे बड़ा अंग है और उपकला उत्तक की कई परतों द्वारा बनता है ।अंतर्निहित मांसपेशियों, अस्थियों,…

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रास्ते और भी हैं

रास्ते और भी हैं “बोलो बाँके बिहारी लाल की जय ! बोलो बंसी वाले की जय ! जय जय श्री राधे…..!” और असंख्य स्वर एक साथ दोनों हाथ ऊपर उठाते हुए दंडवत प्रणाम करने लगते हैं। नित्य प्रतिदिन मंगला झांकी का यही दृश्य होता है। आरती आरम्भ हो चुकी है। नेत्र बन्द किए पद्मा ध्यान…

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झूठ झूठ और झूठ-झूठ के माध्यम से सच की तलाश

झूठ झूठ और झूठ-झूठ के माध्यम से सच की तलाश ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि कोई कवि या कवयित्री एक ही विषय को लेकर एक पूरा संग्रह ही रच डाले। दिव्या माथुर इस माने में एक अपवाद मानी जा सकती हैं, जिन्होंने ‘ख़याल तेरा’, ‘रेत का लिखा’, ‘11 सितम्बर – सपनों की…

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कोविड का कहर

कोविड का कहर यह जो सुंदर सी प्रकृति हमारे चारों ओर बिखरी हुई है- पृथ्वी, चाँद, सौर मंडल, सितारे जो स्वयं एक सौर मंडल हैं, हमारा मिल्की वे (milky way) जिसमे न जाने कितने सौर मंडल हैं बल्कि पूरा ब्रह्माण्ड जिसमे अनगिनत मिल्की वे हैं- यह सारे के सारे उस निर्विकार, निर्गुण पूर्ण ब्रह्म का…

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माँ

माँ सब रिश्तों में सबसे छोटा शब्द पर भावनाएँ असीमित हैं। एक अथाह सा सागर है पर सम्भावनाएँ असीमित हैं । अन्जान दुनिया में जन्म लेकर बहुत डरी हुई थी मैं । जब गोद में लिया तूने महफूज़ , सँभली हुई थी मैं। याद है हर वो पल जब तूने दिया सहारा मुसीबतों के सागर…

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संप्रभु भारत में गणतंत्र दिवस

संप्रभु भारत में गणतंत्र दिवस प्रत्येक भारतीय के लिए दो सबसे महत्वपूर्ण दिन हैं: १५ अगस्त को मनाए जाने वाला स्वतंत्रता दिवस और २६ जनवरी को मनाए जाना वाला गणतंत्र दिवस। दोनों के बीच बुनियादी अंतर यह है कि १५ अगस्त १९४७ को भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की, लेकिन १९५० में देश के संविधान को…

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मैं कतरा कतरा

मैं कतरा कतरा मैं क़तरा क़तरा अन्तस् का लो तुम्हें समर्पित करती हूँ। बस याद में तेरी दीपक सी प्रिय लौ बनकर मैं जलती हूँ। मेरे जीवन के मरुथल में, तुम ही पानी की धार बने। पतझड़ के मौसम में प्रियतम, तुम साँसों का आधार बने। अब दरस की आस में अँखियों से, मैं स्वयं…

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विस्मृति के गर्भ से: रानी रासमणि

विस्मृति के गर्भ से: रानी रासमणि याद कीजिए उन्नीसवीं सदी के मध्य को। भारत का गौरव विदेशी शक्तियों द्वारा रौंदा जा चुका था। समाज गरीबी और जहालत में डूबा हुआ था। समाज तमाम कुरीतियों, अंधविश्वास में आकंठ डूबा हुआ था। वर्ग, जाति और लिंग का विभाजन बहुत स्पष्ट और क्रूर था। समाज पूरी तरह पुरुषसत्ता…

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राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर रामधारी सिंह दिनकर जिन्हें हम ‘जनकवि’ और ‘राष्ट्रकवि’ के नाम से भी जानतें हैं और जो बिहार ही नहीं वरन् पूरे भारत के साहित्यिक आकाश में सूर्य के समान दैदिप्यमान नक्षत्र थें, हैं और रहेंगे… यथा नाम तथा गुण…. । यूं तो दिनकर की ख्याति एक वीर रस के कवि के…

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