ऋचा वर्मा की कविताएं

ऋचा वर्मा की कविताएं १.इस बार का बसंत इस बार के बसंत में खिले पलाश ने, बिल्कुल नहीं लुभाया हमें ये पलाश के फूल लगते हैं छींटे से रक्त के, पत्रविहिन पलाश के गाछ, मानो देहविहिन बहते लहू, न है इंतजार अमलतास के पीले फूलों का, जो चमका करतें हैं सोने की तरह, आजकल भय…

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Invocation

Invocation To You, Our Lady of life The distinct You bridge the hearts of our world You deceive the sun not to set to offer a heavenly embrace Generously you endure the pain Wisely You dominate bright horizons Your tears become earth’s breath Your hands are solid rocks You scatter clouds in your passage Oh,…

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रास्ते और भी हैं

रास्ते और भी हैं “बोलो बाँके बिहारी लाल की जय ! बोलो बंसी वाले की जय ! जय जय श्री राधे…..!” और असंख्य स्वर एक साथ दोनों हाथ ऊपर उठाते हुए दंडवत प्रणाम करने लगते हैं। नित्य प्रतिदिन मंगला झांकी का यही दृश्य होता है। आरती आरम्भ हो चुकी है। नेत्र बन्द किए पद्मा ध्यान…

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पर्यावरण दिवस

पर्यावरण दिवस सूखी नदियाँ,सूखी धरती सिसक उठी करती चित्कार, मैली कितनी अब होऊँगी अब सब मिलो, करो विचार। बहा दिया तुम नाली कीचड़ नदी पवित्र इस गंगा में अपने जन से रक्तपात कर रक्त बहाया दंगा में। जंगल काटे,काटे पौधे काट दिए तुम पर्वत को, अपने सुख में मानव तूँ ने बढ़ा दिया है नफरत…

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ममता कालिया

ममता कालिया ‘ममता से मिलने चलोगी? मुझसे पूछ रहे थे आदरणीय रवींद्र कालिया जी डायरेक्टर ज्ञानपीठ ‘9 साल छोटी पत्नी’ ‘गालिब छुटी शराब’ फ़ेम के लेखक जिन्हें हमने बचपन से पढ़ा था पत्रिकाओं में मुझसे मुखातिब थे! क्या खुशनुमा दिन होगा! और पूछ रहे थे ममता जी यानी ममता कालिया के बारे में, जिनकी प्रसिद्धि…

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उल्टा पुराण

उल्टा पुराण नेहा शादी कर जब पहली बार अपनी ससुराल आई ,तब उसे पता चला उसके ससुराल वालों का विचार उससे कितना भिन्न है। नेहा अपनी माँ बाप की इकलौती संतान थी। यौवन के दहलीज पर वो कदम रखी ही थी, कि उसकी शादी हो गई। दरअसल एक अच्छा खाते पीते घर का लड़का उसके…

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सुनो, कुछ तो करो

सुनो, कुछ तो करो सुनो… कुछ तो करो…! कि इससे पहले सब श्मशानों में तब्दील हो जाए…! कुछ तो करो…. कि इससे पहले घर… मकानों और खंडहरों में तब्दील हो जाए…! कुछ तो करो… इससे पहले कि दवाएँ जहरों में तब्दील हो जाएं…! कुछ तो करो…. इससे पहले कि भोजन खुद भूख में…. और भूख…

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मेरे अंतस के बुद्ध

मेरे अंतस के बुद्ध बुद्ध ना सिर्फ कपिलवस्तु में थे और ना ही मात्र कुशीनारा में, बल्कि वो तो सदैव से ही साधनारत थे मेरे भी मन की सुप्त गुफाओं में, क्योंकि महसूस करती हूं मैंने भी अक्सर वो असहनीय वेदना जो बूढ़े , बीमार और लाचार को देख कर उमड़ती है, गरीबों की दयनीयता…

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