ओठंगनी

ओठंगनी ———— शुद्ध घी से भरी कड़ाही आटे में गुड़ और घी का मोयन निर्जला उपवास रखी अम्मा के हाथों की प्यार भरी थपकियों से बनी रोटी और कड़ाही में डालते ही फैल जाती थी खुशबू ओठंगन की दादी ने बताया था जितने बेटे होते हैं बनते हैं उतने ही ओठंगन चौखट पर खड़ी हम…

Read More

रूहानियत

रूहानियत ‘एक कहानी लिखनी है मुझे, सच्ची कहानी.. मेरे और आपके प्यार की।’ ‘क्या दुनिया हज़म कर पाएगी इसे? और फिर लिखोगी क्या इसमें?’ ‘सिर्फ दर्द, मेरा और आपका..’ ‘फिर तो भूल ही जाओ.. कोई नहीं पढ़ेगा इसे।’ और यही चुनौती तो वह शुरुआत थी मेरी और अरुण जी की कहानी की, जिसे मैं न…

Read More

प्रतीक्षा

    प्रतीक्षा     आभास पाकर धुंधली छवि का आकार लेता प्रिय रूप तुम्हारा द्वार की ओट से ताकती अपलक हर पल रहता है इंतजार तुम्हारा।   क्यों झेलती मैं विरह की व्यथा? जब बसे हो हृदय में कमल बन रोक लेती मैं तुम्हें आवाज देकर बस देख लेते गर तुम पलटकर।   प्राण…

Read More

आत्मकथा

आत्मकथा आत्मकथा लिखने का विचार जब भी आता अन्तर्मन में एक उथल- पुछल्ले सी मच जाती। बचपन बीता, जवानी बीती,चलते ही रहे, सदा चलते ही रहे, खट्टी-मीठी यादों को समेटे। समय जो मुट्ठी में बन्द रेत सा फिसल जाता है फिर कहाँ वापस आता है।जाने क्या क्या रंग दिखाता है … ज़िन्दगी कभी सहेली कभी…

Read More

एक दूजे के लिए

प्र.-  शादी के बाद कितनी बदली आप लोगों की जिंदगी???  उ.- शादी के बाद कुछ परिवर्तन आतें तो है परंतु हम दोनों एक दूसरे से पहले से परिचित थे और परिवार भी बहुत अच्छा और प्रेम करने वाला रहा इसलिये ज्यादा मुश्किलें नही आयी। दोनों ही परिवारों में मैं सबसे छोटी थी इसलिये मुझपर किसी…

Read More

संपादक की बात

संपादक की बात चलना है, केवल चलना है ! जीवन चलता ही रहता है ! रुक जाना है मर जाना ही, निर्झर यह झड़ कर कहता है (आर सी प्रसाद) जो जीवन की धूल चाट कर बड़ा हुआ है तूफ़ानों से लड़ा और फिर खड़ा हुआ है जिसने सोने को खोदा, लोहा मोड़ा है जो…

Read More

नमक का दरोगा

नमक का दारोगा हिंदी साहित्य के इतिहास में उपन्यास और कहानियों की बात हो और मुंशी प्रेमचंद का नाम न हो ऐसा हो ही नहीं सकता है। प्रेमचंद युगांतकारी कथाकार हैं ।इनकी कहानियों में किसानों की दयनीय दशा सामाजिक बंधनों में तड़पती नारियों की वेदना वर्ण व्यवस्था का खोखलापन हरिजनों की पीड़ा आदि का बड़ा…

Read More

नर का पौरुष

नर का पौरुष जब-जब संकट ने जाल बुना नर ने पौरुष का वार चुना यूँ शैय्या पर जीकर क्या हो उसने मृत्यु अधिकार चुना विद्युत सम तलवार लिये तड़ितों को अपने तुनीर धरे लगा गाँठ जनेऊ में भरकर भीषण हुंकार चला कितने रत्नाकर लाँघ दिए अगणित सेतु भी बाँध दिए माँ के वचनों की रक्षा…

Read More