सरस्वती वंदना

सरस्वती वंदना अंधकार जब अम्बर पर छाये नव पल्लव नव उपमा लेकर ….माँ !तू आये …. निराशा के घोर भँवर में फंस जाये नया उत्साह नई उमंग लेकर ….माँ!तू आये ….. कठिन डगर चलना मुश्किल हो जाये नई शिक्षा का संचार लेकर ……माँ!तू आये… सुख समृद्धि की प्रबल कामना पूर्ण न पाये नई दिशा का…

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हार कभी न मानी

  हार कभी न मानी   राह कठिन है जीवन की पर हार नहीं मानी है. पर्वत-सी ऊँची मंज़िल पर चढ़ने की ठानी है. जीवन के पाँच दशक पार हो जाने के बाद जब अपने जीवन को एक द्रष्टा के तौर पर देखती और विश्लेषण करती हूँ तो लगता है एक व्यक्तित्व वस्तुतः अपने माता-पिता…

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मानव को आलोकित करता शिक्षक

मानव को आलोकित करता शिक्षक पं.श्रीकृष्ण चन्द्र झा का जन्म जमींदार परिवार में हुआ था।१० वर्ष के ही थे तो उनके पिता का देहान्त हो गया ।अल्प आयु के कारण सारे रिश्तेदारों ने सम्पत्ति हड़प लिये थे, जमींदारी भी छीन ली थी सरकार ने। भाइयों की देखभाल भी उन्हें ही करनी पड़ी थी। भाइयों को…

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देवी नहीं, नारी हूँ मैंं

देवी नहीं, नारी हूँ मैंं मुझे चाहत नहीं मैं कोई देवी बनूँ, शक्ति का पर्याय कहलाऊँ करुणा की वेदी बनूँ चाह मुझे बस इतनी कि मैं इंसान रहूँ खुलकर साँस लूँ अविरल धारा सी बहूँ, खुले आसमान में पँख फैलाकर उड़ूँ, खुश रहूँ,सपने देखूँ उसे निर्बाध पूरा करूँ अपने प्रेम को हँसता देखूँ अपनी ममता…

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निर्मला

निर्मला मुंशी प्रेमचंद द्वारा रचित प्रसिद्ध हिन्दी उपन्यास निर्मला का प्रकाशन१९२७ में हुआ था । यह उपन्यास मुझे बहुत ही ज़्यादा पसंद है। निर्मला उपन्यास बेमेल विवाह एंव दहेज प्रथा पर आधारित है।यह बेहद मार्मिक कहानी जो दिल को छू जाती है।यह एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक उपन्यास है। मानस पटल पर एक छाप छोड़ देती…

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लॉकडाउन

लॉकडाउन आया कोरोना तू कहाँ से देश हमारे मचा मृत्य का तांडव विश्व भर में मचा हड़कंप ऐसा ज़िन्दगी ही सिमट गई चारदीवारी में बाज़ार हुए बंद सड़कें सुनी पलायन को मजबूर घर काम से बेघर मजदूर ऐसी मुश्किल घड़ी में डट कर खड़े हैं डॉक्टर नर्स मेडिकल स्टाफ करने को देखभाल वहीं पुलिसकर्मी सड़कों…

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प्रतिबंध

प्रतिबंध बेटियां खिलखिलाती रहनी चाहिए बेटियों के खिलखिलाने से बसते हैं घर बेटियां मुस्कुराती रहनी चाहिए बेटियों के मुस्कुराने से बसते हैं घर.. पर बेटियों को खुलकर मुस्कुराने या फिर खिलखिलाने की इजाज़त ही कब थी? लड़कियां यू़ँ बिना बात के खीं खीं करती अच्छी नहीं लगती यहीं तो कहते रहे मां बापू चुनिया और…

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बेटियाँं

बेटियाँं बेटियाँ—उफ़!ये बेटियाँ क्यों इतनी प्यारी होती हैं बेटियां? पिता की लाडली मां की आंखों की नूर होती है बेटियां क्यों इतनी प्यारी होती हैं बेटियां? कभी पकड़कर आँचल माँ का चलती थी लड़खड़ाते कदमों से हो जाती हैं सयानी क्यों इतनी जल्दी ये बेटियाँ? सखियों सी माँ के साथ खिलखिलाती हैं बेटियाँ पिता की…

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