आओ बुद्ध हो जाएं

आओ बुद्ध हो जाएं आओ बुद्ध हो जाएं क्षण भर के लिए उतारकर बोझ संबोधनों का,जिम्मेदारियों का,ओढ़ ले पलभर के लिए उन्मुक्तता उस विहंग भाँति जो बेशक़ उड़ान भरता है अपने नीड़ ख़ातिर विस्तृत आसमाँ में…!! माना बुद्ध होना आसान नही हम स्त्रियों को,नही त्याग सकती वे अपने निर्वाण हेतु घर की दहलीज़, एकांतवास नही…

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CHRISTMAS EVE

CHRISTMAS EVE This cold winter day offers A gift – shooting and twinkling like the first star. Joy –childish but so justified on that day, Hope – as green as a mistletoe, Faith which can move mountains, But often so tiny and fragile. And Love-always the biggest, Although you can find it in a crib….

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उचित सहयोग

उचित सहयोग   जब से संदीप को पैरालिटिक अटैक आया था और उसका कामकाज बंद सा ही हो गया था, तब से परिवार की आर्थिक स्थिति डवाँडोल रहने लगी थी। वैसे तो उसकी पत्नी काजल बहुत ही समझदार और संतुलित महिला थी, हिसाब किताब से घर चलाना उसे आता था, किसी से सहयोग लेना भी…

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संकल्प

संकल्प दीपू ज्यादातर विद्यालय में देरी से ही पहुँचता थ। देर से आने वाले बच्चों की अलग लाइन बनवाई जाती है तथा उनका नाम भी उनकी कक्षा के अनुसार लिखा जाता है ताकि उनके कक्षाध्यापक उन्हें जान सकें और समझा सकें ।उस रजिस्टर में नवीं कक्षा में पढ़ने वाले दीपू का नाम एकाध दिन छोड़कर…

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होली में

होली में यही हसरत मेरे दिल में रही हर बार होली में, करूं रंगीन गोरी के कभी रुखसार होली में । नहीं हद से गुज़र जाना हदों में मयकशी करना हैं वरना नालियों में गिरने के आसार होली में। चलेंगे दौर गुंजियो के चलेंगे दौर खुशियों के चले आओ हमारे घर हैं हम तैयार होली…

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दुख के बादल

दुःख के बादल कोरोना काल चल रहा था।रीमा भी लॉकडाउन का बहुत अच्छी तरह से पालन कर रही थी। लॉकडाउन को चलते दो महीने हो चुके थे।रीमा ने बिल्कुल भी हार नहीं मानी थी।शुरु-शुरु में विचलित जरूर हुई थी,जब टेलीविजन मर मरने वालों को संख्या देखती थी। लॉकडाउन में रीमा ने वो सब काम किए…

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निर्मला लौटेगी ज़रूर !

निर्मला लौटेगी ज़रूर ! हमारे शहर के इस हिस्से में यह तीन तल्ला,आलीशान पीली कोठी, वास्तुकला की अनुपम मिसाल है. जिसका,काले रंग का, ऊँचा सा भारी भरकम, कटाव-दार मुख्य दार है. लोहे की सर्पाकार सीढ़ियाँ, आबनूस की लकड़ी व रंगीन-सफेद काँच से बनी खिड़कियाँ-दरवाजे, ‘चायनीस-ग्रास’ से सजा कालीन-नुमा उद्यान,विलायती गुलाबों की क्यारियाँ, मुख्य द्वार पर…

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भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की- डाॅ वर्गीस कुरियन

नए दौर की नई कहानी – डाॅ. वर्गीज कुरियन डाॅ. वर्गीज कुरियन से मेरा पहला परिचय हुआ था यू.पी.एस.सी. की परीक्षा की तैयारी करते हुए। उनके ‘अमूल’ और ‘श्‍वेत क्रांति’ की चर्चा किताबों में थी। 1948 से लेकर 1965 तक मैनेजर ‘अमूल’ की जबाबदारी उन्‍होंने बड़ी बखूबी निभाई और उस आदमी की सूझ बूझ और…

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वास्तविक आजादी से दूर

  वास्तविक आजादी से दूर हम भारतवासी पिछले 70 वर्षों से आज़ादी की खुशफ़हमी में जरूर जी रहे हैं, परन्तु क्या वास्तव में हम स्वछन्द, स्वतन्त्र और निर्भीक जीवन बिता पा रहे हैं। आज भी देश का एक बड़ा वर्ग जीवन के मूलभूत आवश्यकताओं, जैसे, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्याप्त सन्तुलित आहार इत्यादि से भी वंचित है।…

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माँ एक किरदार अनेक

माँ एक किरदार अनेक मित्र, संबन्धी विपदा में हमारे साथ होते हैं….. लेकिन माँ विपदा में साथ नहीं सामने होती है, संकट मोचन सी होती है “माँ”… बच्चों के अनकहे दर्द को सुन लेती है…. माँ के स्पर्श मात्र से दूर होने लगती है, शरीर के सारे रोग,दोष अपने बच्चों के लिए, सबसे बड़ी वैद्य…

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