मेरा परिचय

मेरा परिचय कहाँ- कहाँ देखूँ निज छवि अपनी, किस-किस से बाँधू निज परिचय मैं? कहाँ-कहाँ ढूँढू निज आधार अपना, किस -किस के आगे शीश नवाऊँ मैं? दिया अस्तित्व को स्वरूप जिन सबने, कहता है मन सबको, निजपोषक अपना। परिचयदात्री स्नेह-धूप में बनी मेरी हर परछाई, वह घना बरगद जिसकी छाँव तले जीवन सुस्ताई। परिचय देती…

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संवैधानिक उपचारों की छत्रछाया में भारतीय महिलाएं

संवैधानिक उपचारों की छत्रछाया में भारतीय महिलाएं 26 जनवरी, 2021 को देश का 72 वां गणतंत्र दिवस हमने मनाया। वैश्विक महामारी के तहत बदले हुए परिवेश में इस राष्ट्रीय गौरव दिवस को हम सभी ने अपने-अपने दृष्टिकोण से मूल्यांकित किया, ह्रदय में राष्ट्र के प्रति स्थित अपने -अपने श्रद्धा के भाव के अनुपात में व्यवहार…

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एक पत्र पिता के नाम

एक पत्र पिता के नाम (मेरे पापा जिनको मैंने कोरोना काल में खो दिया उनको समर्पित) कलम से एक पत्र लिखा है आज लिखा है उनको जो हैं शायद नाराज़ तभी तो अब नहीं कभी आती उनकी आवाज़ जाने कहां चले गए वो जिनपर था मुझको नाज़ न किया कोई गिला न शिकवा किया मुझसे…

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मैं बुद्ध नहीं होना चाहती

मैं बुद्ध नहीं होना चाहती बुद्ध हो सकती थी मैं—- पर मैंने पति को भगवान मान लिया उसकी चाह, उसकी ख़ुशी को अपना सम्मान मान लिया छोड़ दूँ नवजात को ,रात सुनसान , है अंधेरा तू माँ कहलाने लायक़ नहीं , हृदय पाषाण है तेरा बूढ़े सास ससुर , जिनकी सेवा का मिला था उपदेश…

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औरत ,औरत की दुश्मन

प्रायः यह जुमला सुनने को मिल ही जाता है जब कभी किसी औरत को दूसरी औरत द्वारा प्रताड़ित या परेशान किया जाता है। काफ़ी लोगों का यह मानना है कि अधिकतर औरत ही औरत की परेशानी का कारण होती है। यदि हम आस – पास नज़र डालें और औरतों के प्रति हो रहे अपराधों के…

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राम और राजनीति

राम और राजनीति संस्कृत के रम् धातु से बने कण-कण में बसने वाले राम,शब्द और नीति दोनों ही दृष्टियों से राजनीति की हवा में रचे बसे नजर आते हैं।राम की राजनीति को दो प्रकार से देखा जा सकता है। ‘राम की राज-नीति’ और ‘राम की राजनीति’। राम के नाम पर की जाने वाली राजनीति आज…

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पहली मुलाकात

पहली मुलाकात आंखों की शोखियां लरजते लब जाने क्या कह रहे थे चुपके से कुछ तो राज था गहरा उस शरारती मुस्कान के पीछे सुरमुई शाम की आगोश में कोई नूर सी जगमगाहट तेरे चेहरे पे पोशीदा सी थी मोगरे की खुशबू से लबरेज रेशमी घटाओं से टपकती शबनम की बूंदे अल्हड़ मस्त मंद मुस्कुराती…

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खोमचे वाली

  खोमचे वाली अपेक्षाकृत साफ सुथरे चेन्नई स्टेशन पर खड़ी लोकल ट्रेन की महिला बॉगी में फैले गजरों के फूलों और दक्षिण भारतीय व्यंजनों की मिली- जुली सुगंध ने मानो दो घंटो की एक सुखद यात्रा की भूमिका सी लिख दी थी। परंतु यह स्थिति ज्यादा देर तक नहीं रही। धीरे – धीरे डब्बे में…

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दंगों के बाद

दंगो के बाद दंगो के बाद वाला आसमान काला होता है कालिख बहुत दिन तक गिरती रहती है समाज के सर दंगो के बाद खतरनाक होता है राजनीति करना दंगो के बाद की राजनीति लेकिन सबसे खतरनाक होती है एक जली इमारत दूसरी को देखती है पूछती है तुम्हे क्यों जलाया जली इमारत रुआंसी है…

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