आ लौट के आ…
आ लौट के आ… उफ्फ बारह बज गये। एक लम्बी सांस ले उसने लैपटॉप शट ऑफ किया और दोनो हाथ ऊपर कर उंगलियां एक –दूसरे में फंसा चटका दीं। चटर- चटर की आवाज के साथ ही एक पुरानी याद कहीं भीतर कुनमुनाई और दादी का सफेद बालों से घिरा ममतालू चेहरा हवा में उभर आया।होती…
“पसरते शहर ……….….. सिकुड़ते लोग” !!
“पसरते शहर ……….….. सिकुड़ते लोग” !! सुविधाएं जब सनक और रुतबे का रुप ले लेती है, तो दबे पांव जिंदगी में घुन लगना शुरू हो जाता है। कभी शहर का मतलब सुख-सुविधाओं और बेहतर जीवन रहा होगा, पर आज शहरों की हालत देखते हुए ऐसा बिल्कुल नहीं नजर आता। अब हर कोई शहरों की…
माता तुम अनुपम
माता तुम अनुपम प्रकृति का अनुपम उपहार मातृत्व से भरी कोमल नार जननी ममतायी अमृत रसी कोमलांगी माता शक्ति सार नित्य कष्ट सह जाये माते संतान की पीड़ा करती हरण ममता रोम रोम में बसता क्या व्याख्या कैसे हो उद्गार समर्पण माँ का अद्भुत भाव जिसको ना हो माप व् भार माँ तो होती सदा…
एंजेला मिस
एंजेला मिस बात बहुत पुरानी है किन्तु बाल्यावस्था का वह अनुभव आज भी मेरे स्मृतिपटल पर अंकित है। मैं कक्षा पाँच में पढ़ती थी और अपने पठन-पाठन से संबंधित वस्तुओं के बारे में काफी सचेत रहती थी। विशेषकर गणित की पुस्तक के बारे में क्योंकि यह विषय सदा मेरे लिये टेढ़ी खीर ही बना रहता…
बंद चेहरों का शहर
बंद चेहरों का शहर (कोरोना संस्मरण) जनवरी 2020 : कोरोना का नाम पहले नहीं सुना था लेकिन खबरों में चीन के वुहान की हल्की-फुल्की बातें सामने आ रही थी। चीन दूर है, यहाँ उसकी हवा नहीं आएगी। मन को आश्वस्त किया। राष्ट्रपति भवन में गणतंत्र दिवस की चाय का आनंद लिया। दबे स्वरों में लोगों…
फागुन की बयार
फागुन की बयार छाया है बसंत चहुंओर बही है फागुन की बयार धरती ने ओढ़ी पीली चुनरिया हुलसे है जियरा हमार पूरी धरती है लाल-लाल चारों ओर उड़ा गुलाल नीले,पीले, लाल हो रहे सभी के गाल और द्वार चढा नशा भाँग का कर रहे हम आज हुड़दंग आज तो खूब सखि रे मनवा में छाया…
एक खामोश घर की आवाज़
एक खामोश घर की आवाज़ घर को खड़ा करने के लिए जितनी ज़रूरत ईंट-पत्थर की होती है, उतनी ही ज़रूरत होती है चुप्पियों की। चुप्पियाँ अक्सर वह आवाज़ होती हैं, जो किसी भी तूफ़ान से अधिक गूंजती हैं। सावित्री ऐसी ही एक चुप्पी थी , गहराई से भरी, स्थिर और सहनशील। “चुप्पी एक…