मां की ममता

मां की ममता माँ मेरी माँ तूँ ममता की मूरत है, निश्छल और प्यारी हसीं तेरी सूरत है, वो एहसास आज भी मेरे पास है….. जब तूँ मुझे हर पल अपने आँचल में ही छुपा कर रखना चाहती थी, क्यूंकि तुम्हे डर था की किसी की नज़र न लग जाये मुझे,… मैं बड़ी हो गयी…

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तुम मेरे पास हो …हमेशा!

माँ, तुम हो यहीं कहीं,..मेरे आसपास, भींगी पलकें जब यादों का सहारा चाहती हैं, तुम तब भी -मेरे साथ होती हो ..माँ, जैसे मैं तुम्हें छू सकती हूँ, महसूस कर सकती हूँ– ”तुम्हारे कदमों क़ि आहट, जब ये अधर कुछ्फरियाद करते हैं, तो जैसे.. तुम सुनती हो मेरी आवाज, बिन कहे मान लेती हो, मेरी…

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मां के सपने

“मां के सपने” कितने सपने संजोए थे तूने, हम सबके संग, कितने सपने थे तुम्हारी आंखों में, कितनी कल्पनाएं थी, तुम्हारे आंखों में चमक, जिन्दगी जीने की ललक, एक उल्लास मन में लिए, सबको संवारा बड़ी लगन से, अपनी सजग नयन से, कई सपने भी टूटे, फिर भी !! तुम मुस्कुराती रही, हम-बच्चों के संग,…

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माँ

माँ मुझे याद है आपको अक्सर तीज त्योहार पर पूछती थी कि क्या चाहिए आपको और आपका हमेशा एक ही जवाब होता था…. मुझे मेरे सभी बच्चों की खुशहाली चाहिए। सच में माँ कभी अपने लिए कुछ नहीं चाहती, वो ख़ुश होती है, बच्चों को उनके मन पसंद खाना खिलाकर, वो ख़ुश होती बच्चों के…

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अब मैं भी माँ जैसी ही माँ बनूँगी

अब मैं भी माँ जैसी ही माँ बनूँगी… ” मैं भी एक माँ हूँ पर टूट जाती हूँ कई बार… फिर माँ आती है … कभी ख़्वाबों में,कभी बातों में और बढ़ाती है अपना हाथ खींच लेती है मेरे सारे दर्द दफन कर लेती है उन्हें भी अपने सीने में किसी को भनक नहीं लगने…

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एक मां हूँ मैं

एक मां हूँ मैं एक मां हूँ मैं, अपने बच्चों के लिए, कोमल भावनाएं रखतीं हूँ। दुनिया की सारी खुशियां, निछावर करना चाहती हूँ। चाहतीं हूँ.. मेरे बच्चे… तू जिन राहों से गुजरे, फूल बिछे हों,उन राहों पर। पर मेरे बच्चे… जान ले कई बार, यह जिंदगी फूलों की सेज है, तो कई बार कांटों…

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मदर्स डे

मदर्स डे भारतीय संस्कृति में नहीं है ……हमारे लिए तो पृथ्वी माता है , गाय मां है, गंगा मैया है…. धरती माता की चरण वंदना से हमारे दिन की शुरुआत होती है। गौ माता हमारा पेट पालती है और जीवन प्रदायिनी गंगा मैया जिसे हम पियरी चढाते हैं हमें मोक्ष भी देती है । भारतीय…

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श्रमदान

श्रमदान आधी आबादी करती श्रमदान बिन वेतन ताजमहल यादगार निशानी “कटते हाथ” होते हैं पूरे मजदूरों के हाथों स्वप्न हमारे आनंदबाला शर्मा साहित्यकार जमशेदपुर, झारखंड 0

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बेटा मजदूरिन का

बेटा मजदूरिन का एक बेटा मजदूरिन का, मुँह ना देखा था पिता का। दहलीज पर झोपड़ी के, था ,तरसता भूख से, तलाशती आँखों से माँ को, हर चेहरे को निहारती। थकी पलकों को सहला जाती, नींद अपने आँचल में। कभी जागता कभी सोता। ना जाने माँ कब आयेगी। सिने से लगायेगी, लाल को एक था…

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टिस

टिस गर्मी की तपती धूप सर्दी की ठिठुरन आंधी , तूफान या हो भीगी बारिश हर मौसम की मार सहता हूँ मैं बेबस मज़दूर क्योंकि मेहनत ही मेरा कर्म है वही मेरी रोज़ी रोटी बनाता हूँ बड़े बड़े घर, इमारतें,आलीशान बंगले उठा टोकरे मिट्टी ईंटो, गारे, सीमेंट के पर खुद के रहने के लिये होती…

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