दसवें दिन ‘माँ दुर्गा’ क्यों नहीं ??

दसवें दिन ‘माँ दुर्गा’ क्यों नहीं ?? हर बार नवरात्र समाप्त होते ही दसवें दिन ‘श्रीराम’ एक नायक के रूप में उभरकर सामने आते हैं, और ‘रावण’ खलनायक के रूप में पेश किया जाता है। विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में भी देखा जाता है। मैंने शायद एक-दो बार ही रावण…

Read More

एक लड़की थी…

एक लड़की थी… शरारती किस्से वो फ़ोन पर सुनाया करती थी एक लड़की थी मुझे गोद में सुलाया करती थी बिन बाबा के कैसे बीती थीं उसकी माँ की रातें कुछ बेचैनियाँ थीं सिर्फ़ मुझे बताया करती थी डर मेरी उल्फ़त से था, कोई और पसंद था उसे इसी बात पर ज़्यादा खुद को रुलाया…

Read More

मेरी पीढ़ी का सच

मेरी पीढ़ी का सच कहा जाता है एक व्यक्ति अपने जीवन में पाँच जीवन जीता है,देखता है और समझता है।दादा-नाना से लेकर नाती- पोते तक पर सबसे अधिक लगाव मनुष्य को अपनी पीढ़ी से ही होता है। देश की स्वतंत्रता के वे प्रारंभिक दिन थे।बचपन उसका भी था और मेरा भी।उत्साह और उमंग से भरे…

Read More

सतरंगी संस्कृति के रंग

सतरंगी संस्कृति के रंग होली की फगुनाहट हवा में घुल रही है घुलनी भी चाहिए…… साल भर बाद होली आ रही है । पर क्या इस बार भी केवल बचपन की मधुर स्मृतियों के रंगो से ही होली खेली जाएगी या यादों के झरोखों से बाहर गली में भी झाँकना ताकना होगा? क्या सिर्फ़ गुज़रे…

Read More

श्रद्धांजलि

महान लोक-शिक्षक ……स्वामी विवेकानंद !! नव भारत का उदय होने दो। उसका उदय हल चलानेवाले किसानों की कुटिया से, मछुए, मोचियों और मेहतरों की झोपड़ियों से हो, बनिये की दुकान से, रोटी बेचने वाले की भट्ठी के पास से प्रकट हो। कारखानों, हाटों और बाजारों से वह निकले। वह नव भारत अमराइयों और जंगलों से,…

Read More

बदल रही है भारत की तस्वीर

बदल रही है भारत की तस्वीर हमारा गणतंत्र -हमारी राष्ट्रीय एकता-सम्प्रभुता-और अस्मिता का एक गौरवशाली दिन, पूर्ण स्वराज्य की अवधारणा के साकार प्रतिफलन का एक उज्जवल क्षण , एक नई सुबह-जागृति की, विश्वास की,एकता व गर्व-बोध से भरे गणतंत्र की, हाथों में तिरंगे झंडे उठाये हजारों बच्चों की एक सम्मिलित आवाज ” भारत माता की…

Read More

अपने राम

अपने राम   इनके,उनके,किनके राम, सबके होते अपने राम। कबिरा के भी अपने राम, तुलसी के भी अपने राम।   तन में राम,मन में राम, सृष्टि के कण -कण में राम। क्षण में राम, तृण में राम, सब भक्तों के दिल में राम।   केवट के भी अपने राम, सबरी के भी अपने राम। सुग्रीव…

Read More

जुझारू नेत्री-रोज़ा लुईज़ मक्कॉली पार्क्स

जुझारू नेत्री-रोज़ा लुईज़ मक्कॉली पार्क्स रोज़ा लुईज़ मक्कॉली पार्क्स (4 फ़रवरी 1913 – 24 अक्टूबर 2005) अफ़्रीकी-अमेरिकी नागरिक अधिकार कार्यकर्त्ता थीं जिन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका की कांग्रेस ने “द फ़र्स्ट लेडी ऑफ़ सिविल राइट्स” (नागरिक अधिकारों की पहली औरत) और “द मदर ऑफ़ द फ्रीडम मूवमेंट” (आज़ादी लहर की माँ) नामों से पुकारा। रोजा पार्क्स…

Read More

पटना विमेंस कॉलेज और मेरा क्रिकेट का खेल

पटना विमेंस कॉलेज और मेरा क्रिकेट का खेल साल १९७६: मैट्रिकुलेशन के रिजल्ट आ गए थे . मार्क्स बहुत अच्छे थे और लगता था पटना साइंस कॉलेज में एडमिशन हो जायेगा . घर में इसकी चर्चा थी. घर में लोग मुझे डॉक्टर का करियर चुनने की सलाह दे रहे थे.पहले से भी मेरे अपने चाचा…

Read More

सुनो, कुछ तो करो

सुनो, कुछ तो करो सुनो… कुछ तो करो…! कि इससे पहले सब श्मशानों में तब्दील हो जाए…! कुछ तो करो…. कि इससे पहले घर… मकानों और खंडहरों में तब्दील हो जाए…! कुछ तो करो… इससे पहले कि दवाएँ जहरों में तब्दील हो जाएं…! कुछ तो करो…. इससे पहले कि भोजन खुद भूख में…. और भूख…

Read More