दसवें दिन ‘माँ दुर्गा’ क्यों नहीं ??

दसवें दिन ‘माँ दुर्गा’ क्यों नहीं ?? हर बार नवरात्र समाप्त होते ही दसवें दिन ‘श्रीराम’ एक नायक के रूप में उभरकर सामने आते हैं, और ‘रावण’ खलनायक के रूप में पेश किया जाता है। विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में भी देखा जाता है। मैंने शायद एक-दो बार ही रावण…

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मेरी माँँ

मेरी माँँ माँ की ममता की छाँव है माँ की आवाज दिल का सुरुर है माँ की मौजूदगी दिल का सुकून है माँ की मुस्कुराहट फूलों की खुश्बू है माँ का दुख दिल का लहू है माँ की ममता प्यार का साया है माँ के पैरों के नीचे सारा जहाँ है माँ का साया सघन…

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हम सुंदर दिखते हैं

हम सुंदर दिखते हैं ट्रिन ट्रिन ट्रिन… मेरी सुबह की शुरुआत ऐसी होती है। सुबह साढ़े छह बजे उठो, गैस पर चाय का पानी चढ़ाओ, उसके खौलने का इंतजार करो। परात में आटा निकालो, उसमें नमक मिलाओ और पानी डालो। फिर उसको धीरे-धीरे गूंथ डालो। चाय का पानी भभक रहा है। चाय की पत्ती डालो।…

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विरासत का वर्तमान

  विरासत का वर्तमान आखिर, जिस बिहार का अतीत इतना गौरवशाली रहा है आज वह इतना विकृत कैसे हो गया। बिहार में न तो प्राकृतिक संसाधनों की कमी है और न ही योग्यता की। आखिर वो कौन-से कारण हैं जिनके कारण रोजी-रोटी कमाने बिहारियों को दूसरे राज्यों में जाना पड़ता है। कुछ तो होगा। ऐसा…

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हमारी गुल्लकें

हमारी गुल्लकें ज़िन्दगी क्या है, चंद गुल्लकें जिन्हें हम लमहों, मुलाक़ातों, यादों और अहसासों के सिक्कों से भरते रहते हैं। ये भरती जाती हैं बचपन से लेकर हमारे आखिरी दिनों तक। इन गुल्लकों के कुछ सिक्के तो इतने भारी और असह्य होते हैं कि उनसे छुटकारा पाने को मन करता है और कुछ ऐसे होते…

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पूर्णाहुति

पूर्णाहुति “आज बदन टूट रहा है।रात को सिर्फ दूध ही दे देना”, ८५ वर्षीय बृजभूषण जी ने श्याम सुन्दर से कहा।श्याम और बृजभूषण के बीच कोई सांसारिक रिश्ता नहीं था। बृजभूषण जी, जिन्हे परिचित प्यार से बाबू जी कह कर सम्बोधित करते थे, अत्यंत लोकप्रिय थे। उन्होंने अपना सारा जीवन एक निस्वार्थ निष्काम भाव से…

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पिता एक उम्मीद

पिता एक उम्मीद पिता -चाँद सितारों में निखर उम्मीद की किरण बन जाते है। नई उम्मीद के साथ ख़ुशियों जहाँ बसा जाते हैं । पिता,पिता के प्यार से गूँजती सारा भु मंडल हैं । उदगार सजा रखा धरती मैया है । पिता- बच्चों के दिल किताबों में प्यार सजा रखा हैं । पन्ने की हरकत…

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लॉकडाउन और शिक्षण समाज

लॉकडाउन और शिक्षण समाज बात उन दिनों की है जब समपूर्ण संसार में हड़कंप मचा था,त्राहिमाम की वस्तु स्थिति थी जीवन चक्र जैसे रूक सा गया था।एक अंजान अदृश्य शत्रु के भय से और इस भय से उपजा जो रक्षात्मक उपाय था उसे लॉकडाउन की संज्ञा दी गई।क्या विद्यालय क्या देवालय सब जगह बस ताले…

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एक और स्वप्न

एक और स्वप्न बाहर तेज गर्जना के साथ बारिश हो रही थी, रात गहराने लगी थी। मैं भी रसोई और अन्य सारे कार्यों से निपट कर बस बिस्तर पर पड़ ही जाना चाह रही थी कि अचानक फोन की घंटी बज उठी। उधर नयना दीदी थी, भर्राई हुई आवाज में उन्होंने कहा-“प्रोफ़ेसर साहब नहीं रहें।”मैं…

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