बसंत बहार

बसंत बहार पीली सरसों पीले खेत बसन्ती छटा में रंगा धरती का परिवेश पवन सुगन्धित मन आह्लादित बसंत बहार सुनाये रे… पतंग रंगा, नीला आकाश “वो काटा” से गूंजा जाए अमराई बौरें झूम झूम डोलें मन मयूर बहका जाए रे… सरस्वती पूजन मन्त्रोच्चारण, कानों में शहद सा घुलता जाए हिय हुलसै,मन उडे बचपन की गलियों…

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मकर संक्रांति स्पेशल दही

*मकर संक्रांति स्पेशल दही* दो लोगो के लिए सामग्री:- दूध (फूल क्रीम) – १ किलो चीनी- १०० ग्राम अमूल होल पाउडर दूध की दो छोटी पाउच तरल पठाली गुड – दो चम्मच एक चम्मच गाढ़ी जमावन दही मिट्टी की हांडी -१/२ किलो साइज     विधि:- १ किलो दूध को गैस चूल्हा पर गरम करें…

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स्मृति के पल

स्मृति के पल जब भी मैं अपने बचपन को याद करती हूँ तो अपने आपको एक ऐसे संसार से घिरा पाती हूँ जहाँ चारों और पत्र पत्रिकाओं, समाचार पत्रों की सुगंध बिखरी हुई रहती थी।बालभारती, पराग, चंपक,चंदामामा,नन्दन की लुभावनी दुनिया थी मेरे चारों ओर। समाचार पत्रों के बालजगत, पहेलियाँ मन को भरमा के रखती थीं।…

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माँ तो बस माँ ही होती है

माँ तो बस माँ ही होती है आज भी याद है माँ की वह तस्वीर बचपन में ,स्कूल जाते समय टीफिन लेकर पीछे दौड़ती माँ स्कूल से आते ही खाना खिलाने के लिए घंटों मशक्कत करती माँ लुकछिपी के खेल में जानबूझ कर शिकस्त खाती माँ मेरी चिंता में हर पल अपने आपको जलाती माँ…

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माँ एक किरदार अनेक

माँ एक किरदार अनेक मित्र, संबन्धी विपदा में हमारे साथ होते हैं….. लेकिन माँ विपदा में साथ नहीं सामने होती है, संकट मोचन सी होती है “माँ”… बच्चों के अनकहे दर्द को सुन लेती है…. माँ के स्पर्श मात्र से दूर होने लगती है, शरीर के सारे रोग,दोष अपने बच्चों के लिए, सबसे बड़ी वैद्य…

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डॉ विनीता कुमारी की कविताएं

  डॉ विनीता कुमारी की कविताएं 1.भारत की नारी कवि नहीं, कवयित्री नहीं, भारत की नारी मैं हृदय की बात सुनाती हूं। वैदिक जीवन – दर्शन का, भारत के वीर शहीदों का, वतन के राष्ट्रगीतों का, मैं वंदनगान करती हूं। भारत की नारी मैं, हृदय की बात सुनाती हूं। गोरे घर छोड़ गए, लोगों को…

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भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की-अहिल्याबाई होल्कर

अहिल्याबाई होल्कर वैसे तो भारत की वीर भूमि पर बहुत से शूरवीरों ने जन्म लिया, मगर कुछ ऐसे भी शूरवीर हुए जो हमेशा के लिए अमर हो गए, जिनमें से एक नाम अहिल्याबाई होल्कर का है, महाराष्ट्र के अहमदनगर के चौंडी गाँव में सन् 1725  में जन्मीं अहिल्याबाई होल्कर के पिता माकोंजी शिंदे सम्मानित धांगर…

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मंजिल मिलेगी, चुनैतियों के पार

मंजिल मिलेगी, चुनैतियों के पार बात पुरानी है, यही कोई साठ साल पहले की… मैं अपने घर की चुलबुली, सुन्दर, हँसने-हंसाने वाली सबकी लाड़ली गुडिया थी …मेरी बड़ी बहन मुझसे ठीक विपरीत, गंभीर, शान्त, पढ़ाकू …. एक दिन मेरे ताऊ जी ने मेरी बहन का मनोबल बढ़ाने के उद्देश्य से मुझसे कहा, “ज़रा अपना हाथ…

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बसंत

बसंत “सकल बन फूल रही सरसों, टेसू फूले अम्बुआ बौरे, कोयल कूकत डार डार, और गोरी करत सिंगार, मालनियाँ घरवा ले आयी करसों।” अमीर खुसरो का जाना माना कलाम, जो उन्होंने तेहरवीं और चौदहवीं शताब्दियों के बीच लिखा, और जो आज भी संगीत प्रेमियों के मानस में गूँज रहा है | राग बहार में लयबद्ध…

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