एक मां हूँ मैं

एक मां हूँ मैं एक मां हूँ मैं, अपने बच्चों के लिए, कोमल भावनाएं रखतीं हूँ। दुनिया की सारी खुशियां, निछावर करना चाहती हूँ। चाहतीं हूँ.. मेरे बच्चे… तू जिन राहों से गुजरे, फूल बिछे हों,उन राहों पर। पर मेरे बच्चे… जान ले कई बार, यह जिंदगी फूलों की सेज है, तो कई बार कांटों…

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गुलाब

गुलाब तुम्हें तो पता भी नहीं होगा कि मेरे जीवन का पहला गुलाब जो तुमने दिया था अपने पहले प्रेमपत्र में लपेटकर मुझे उसे अबतक संभाल रखा है मैंने प्रेमपत्र के अक्षर धुंधला गए हैं कागज़ में जगह-जगह उभर आए हैं भूरे, चितकबरे धब्बे और लाल गुलाब की पंखुड़ियां सूखकर काली पड़ गई हैं मैं…

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Quarantine

Quarantine Pandemic world is not mine although I drift with it with mask on my face through surroundings possessed by the springtime Isolated I cannot smell the flowers I am not enjoying virtual paradise walk just around the corner of my seclusion Izabela zubko Writer Poland IZABELA ZUBKO – poetess, journalist and translator. She is…

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झूठ झूठ और झूठ-झूठ के माध्यम से सच की तलाश

झूठ झूठ और झूठ-झूठ के माध्यम से सच की तलाश ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि कोई कवि या कवयित्री एक ही विषय को लेकर एक पूरा संग्रह ही रच डाले। दिव्या माथुर इस माने में एक अपवाद मानी जा सकती हैं, जिन्होंने ‘ख़याल तेरा’, ‘रेत का लिखा’, ‘11 सितम्बर – सपनों की…

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तुम मेरे पास हो …हमेशा!

माँ, तुम हो यहीं कहीं,..मेरे आसपास, भींगी पलकें जब यादों का सहारा चाहती हैं, तुम तब भी -मेरे साथ होती हो ..माँ, जैसे मैं तुम्हें छू सकती हूँ, महसूस कर सकती हूँ– ”तुम्हारे कदमों क़ि आहट, जब ये अधर कुछ्फरियाद करते हैं, तो जैसे.. तुम सुनती हो मेरी आवाज, बिन कहे मान लेती हो, मेरी…

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सिर्फ एक देह नहीं है औरत

*सिर्फ एक देह नहीं है औरत* ================ ” *औरत काम पे निकली थीं* *बदन घर रख कर* *ज़िस्म खाली जो नज़र आए तो मर्द आ बैठे*  !! “ औरत की आजादी की बात जब भी की जाती है तो एक सवाल अब भी जेहन में कौंधता है कि क्या औरत का अस्तित्व सिर्फ एक शरीर…

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भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की- सुभद्रा कुमारी चौहान

अग्रणी महानायिका “हिंदी साहित्य हमेशा समाज से सम्बद्ध रहा है। साहित्य मात्र मनोरंजन का माध्यम नहीं वरन सामाजिक समस्याओं और विसंगतियों का आईना भी है।” आधुनिक हिंदी साहित्य के क्षेत्र में शुरुआत से ही देश की स्वतंत्रता की आवश्यकता और गुलामी की विवशता पर लेखकों ने खुल कर कलम चलाया था।भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लेकर आज…

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उल्टा पुराण

उल्टा पुराण नेहा शादी कर जब पहली बार अपनी ससुराल आई ,तब उसे पता चला उसके ससुराल वालों का विचार उससे कितना भिन्न है। नेहा अपनी माँ बाप की इकलौती संतान थी। यौवन के दहलीज पर वो कदम रखी ही थी, कि उसकी शादी हो गई। दरअसल एक अच्छा खाते पीते घर का लड़का उसके…

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