दो मोर्चों पर स्त्री
दो मोर्चों पर स्त्री पुरूष मानसिकता वाले इस समाज में आसान नहीं स्त्री का खड़ा हो पाना स्वतंत्रता से ,बेबाक ,हँसना-मुस्कुराना । पढ़-लिख कर काबिलियत के बल -बूते बाहर पाया मुकाम, बनायी अपनी पहचान भाया तेरा कमाना, काम के लिए बाहर जाना पर नहीं रास आया , तेरा निर्णायक कुछ कह जाना दो-दो मोर्चों पर…