मोटेराम जी शास्त्री

मोटेराम जी शास्त्री कौआ चला हँस की चाल, अपनी भी भूल गया, प्रस्तुत पंक्ति ही जैसे आधार है मुंशी प्रेमचंद जी की हास्य कथा पंड़ित मोटेराम जी शास्त्री का। बड़े ही सरल एवं सहज भाव से इस पूरी कहानी को आकार दिया है मुंशी जी ने। बहुत ही कम पात्रों के साथ इस कहानी का…

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Before Christmas

Before Christmas One day before Christmas comes Twenty-four hours before enjoining the Christmas carol My fingers have sung themselves with poetry I filled the sheets of my life with the lyrics of my songs Then I’m going to look for you I invite to accompany me here Feel the presence of the little Lord Jesus…

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नारी हूँ

नारी हूँ नारी हूँ नारी ही कहलाऊँ न मैं राधा हूँ न मैं मीरा न मैं सीता हूँ न मैं गांधारी न मैं लैला हूँ न मैं सोहनी न मैं देवी हूँ न मैं दासी मैं तो सिर्फ ईश्वर की रचना त्याग, प्रेम ,ममता ,वात्सल्य से परिपूर्ण नारी हूँ ………. जिसे कई नामों से जाना…

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कमली

कमली “कमली….अरे कमलिया! कहाँ मर गयी रे? तुझे कहा था इन बकरियों को बाड़े में बांधने… सारी साग चबा गयीं…ये लड़की तो मेरे जी का जंजाल ही बन गयी है”. कमली की चाची भुनभुनाती हुई बकरियों को हाँकने में लग गयी. उधर चाची की घुड़की औऱ बड़बड़ाहट सुनकर कमली भागती हुई आई. उसे पता था…

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बाल गणपति

बाल गणपति निरखत मैया हांसे अति लो आया मेरा बाल गणपति ।। झमक झमक झम – घुंघरू बाजे धमक धमक धम- ढ़ोलक साजे ध्रातिट ध्रातिट -पग चालन गति लो आया मेरा बाल गणपति ।। थुलथुल दुलदुल – चित्त का चोर मृदुल छवि- छाये चहुँ ओर चिहुंक चिहुंक – नटखट वो कति लो आया मेरा बाल…

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सैनिक का संदेश

सैनिक का संदेश घर से निकला था, मादरे वतन की हिफाजत में। मेरे इरादे और हौसलों में, जीत का ही जुनून था। ये तो मिट्टी का कर्ज़ था, जो लहु देकर जा रहा हूँ । सौंप कर जा रहा हूँ , ये वतन तेरे हाथ में, ए- मेरे नौजवान साथियों । मैं सरहद देखता हूँ…

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शिक्षा का उद्देश्य और नई शिक्षा नीति

शिक्षा का उद्देश्य और नई शिक्षा नीति अच्छी पढ़ाई, अच्छा जीवन’ – ये नारा शायद सदियों से बच्चों को, उनके माता-पिता को जीवन में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहा है। शिक्षा से अनेक द्वारा खुल जाते हैं; ज्ञान के, अच्छे समाज के, अच्छी नौकरी के। मानव जाति में एक जिज्ञासु प्रवृत्ति है और…

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दो शब्द प्रेम के नाम

दो शब्द प्रेम के नाम नई दुनिया की नई रंगत, कब फरवरी का माह प्रेम को अर्पित हो गया और वह भी एक विशिष्ट खोल में लिपटा हुआ, पता नहीं, पर प्रेम तो शाश्वत है, इतना व्यापक कि एक पल भी जीवन का धड़कना प्रेम के बगैर संभव नहीं। सृष्टि अगर सृजन से जुड़ी है…

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महाभिनिष्क्रमण

महाभिनिष्क्रमण आखिर चले ही गए तुम हाँ बताया था तुमने जीवन का ध्येय विश्व का उद्धार बोध की पिपासा बहुत से कारण थे बस मैं ही नही थी पिछले जन्म से चाहा था तुम्हें सुमेध भद्रा बनकर वादा लिया था अगले जन्म का क्या खूब निभाया तेरह वर्षों की तपस्या का प्रसाद था ‘राहुल’ पर…

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