जाना है बहुत दूर

जाना है बहुत दूर आज उम्र के इस पड़ाव पर आकर अपने बारे में कुछ सोचने की कोशिश करती हो तो मेरा बचपन सबसे पहले मुझे याद आता है । मेरा जन्म कलकत्ता में हुआ था। मेरे माता पिता शिक्षित और बहुत संस्कारवान थे । परिवार में कोई चीज की कमी नहीं थी और हमें…

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कैसे रहा जाएं बी पॉजिटिव

कैसे रहा जाएं बी पॉजिटिव व्यथित मन परमात्मा की क्रूर करनी के आगे लाचार हूं,आहत हूं और उसकी निष्ठुरता से बेहद नाराज भी हूँ कि ऐसा क्यों किया। रोज इतने जनों को एक-एक कर जाते हुए देख कर, सुन कर मन मे न चाहते हुए भी निराशा आ ही जाती थी,पर थोड़ी देर बाद सोचती…

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एक स्त्री की तीन आवाजें !

एक स्त्री की तीन आवाजें !   दोपहर की चाय जब तक उबलती, तब तक सीमा खिड़की के पास रखी कुर्सी पर बैठ जाती। सामने स्कूल से लौटते बच्चे, दूध वाला, दोपहर की सुस्ती में पसरे कुत्ते और बगल की अरोड़ा आंटी की आवाज़ें – सब रोज़ की तरह चल रहा होता, पर सीमा की…

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बड़े घर की बेटी

बड़े घर की बेटी ‘बड़े घर की बेटी’ सामाजिक जीवंतता की एक कालजयी रचना है। मुंशी प्रेमचंद की कहानियां सीधी-साधी होती हैं और सामान्य ढंग से बातें करती हैं। इस कहानी में के चरित्र आने स्वाभाविक रूप में हैं और कथाकार ने कहीं भी भाषा कौशल या अभिव्यक्ति चतुराई का प्रयोग नहीं किया है। इन्हीं…

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पापा

पापा प्रो. सरन घई, संस्थापक, विश्व हिंदी संस्थान, कनाडा ———————————————————— अंगुली थाम के बहुत चलाया पापा तुमने, जब-जब गिरा मैं बहुत प्यार से उठाया तुमने, मेहनत कर दिन-रात था पापा पढ़ाया तुमने, हरदम सच्ची राह पे चलना सिखाया तुमने। जब-जब ठोकर लगी यही सिखलाया तुमने, देखके सामने चलो ये पाठ पढ़ाया तुमने, जब रस्ते में…

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हम तुम

हम तुम हम तुम जब मिले थे कितने अंजान एक दूसरे से बिल्कुल दो अजनबी से धीरे धीरे हुई जान पहचान कभी नोंक झोंक कभी तीखी तकरार कभी गुस्सा कभी सुलह यूँ कब फिर बन गए दोस्त और रंग गये एक दूजे के प्यार में खबर भी न हुई यूँ वक्त लेता रहा इम्तिहान कई…

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ममता कालिया से सन्दीप तोमर की साहित्यिक चर्चा

ममता कालिया से सन्दीप तोमर की साहित्यिक चर्चा ममता कालिया हिंदी साहित्य की प्रमुख भारतीय लेखिका हैं। वे कहानी, नाटक, उपन्यास, निबंध, कविता जैसी अनेक साहित्यिक विधाओं में बराबर दखल रखती हैं। हिन्दी कहानी के परिदृश्य पर उनकी उपस्थिति सातवें दशक से निरन्तर बनी हुई है। लगभग आधी सदी के काल खण्ड में उन्होंने 200…

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पर्यावरण और त्योहार

“पर्यावरण और त्योहार “ डरे सहमे से पेड़-पौधे जा पहुंचे मानव के पास दीपावली करीब आ गई तो उनकी थीं शिकायतें खास.. पत्ते, शाखाएं, फूल और कलियाँ सबके सब कुछ घबराए थे नन्ही घास,बेलें, लताएँ, फल मुँह बनाए और गुस्साए थे-.. “हर तरफ दीवाली की खुशियाँ हैं पर हम सब सहमे से खड़े हैं अजीब…

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गाँधी का शिक्षा दर्शन : कितना प्रासंगिक

गाँधी का शिक्षा दर्शन : कितना प्रासंगिक महात्मा गाँधी के विराट् व्यक्तित्व का प्रभाव भारतीय मानस पर मर्यादा पुरुषोत्तम राम के आदर्श जीवन से कम नहीं है. अल्बर्ट आइंस्टीन ने सही कहा था कि आने वाली सदियां विश्वास नहीं करेंगी कि गांधी जैसा हाड़ मांस का कोई पुतला इस धरती पर चला होगा।राष्ट्र पिता मोहन…

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