ईश्वर की चेतावनी

ईश्वर की चेतावनी ये कोरोना एक रोग नहीं जो विषाणु से फैला है, ये कुदरत का कहर है जो जानलेवा और विषैला है!! ये हम सबका फैलाया जहर है जो एक दिन का प्रतिफल नहीं सदियों का नतीजा है विष जो हमारे दिल में था जो आज जाकर निकला है!! कांप गए हम बस इतने…

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प्रेम का पथ

प्रेम का पथ प्रकृति ने सिखाया प्रेम समर्पित भाव से बंधन मानव से मानव करे प्रेम हृदय देखो बने चंदन। नेह से बने रिश्तों का महकता है सदा प्रकाश प्रेम जोत जगे हृदय में हो जाता मन वृंदावन। ममता के पलने में झूले प्रेम आनंदित हो संतान मात पिता , गुरू सखा प्रेम ही है…

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पहचानने स्वयं को

पहचानने स्वयं को अधिकतर लोगों को कहते सुना है कि मेरी इससे जान -पहचान है ,मेरी उससे जान -पहचान है ।मेरी ऊँचे स्तर तक जान -पहचान है ।कई लोगों से मेरे संबंध हैं तो यह बहुत अच्छी बात है ।आपका यह गुण है कि आप बहुत लोगों को जानते हैं ,आपकी पहचान का दायरा बहुत…

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बेचारी शिक्षा

बेचारी शिक्षा पुस्तकों की गलियों में भटकते – भटकते, मुलाकात हो गई शिक्षा से, मैंने पूछ लिया उससे, यूंही हाल उसका। रूआंसी होकर बोली वह, मत पूछो क्या हाल है मेरा, पहले रहती थी गुरुकुलों में, सादगी और संस्कारों के संग, पर अब हो गईं हूँ बाजारू, कभी पैसों के बल पर बेची और खरीदी…

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मेरे प्रिय तुम गुलाब हो!

मेरे प्रिय तुम गुलाब हो! नेहरू के कोट से चलकर, प्रियतमा के जूड़े में अठखेले, रंग बिरंगे चाहे जितने हो, पर, सुर्ख लाल में हो अलबेले, मादकता की तुम हो परिभाषा, तुम सुहाग सेज की अभिलाषा, मेरे प्रिय तुम गुलाब हो! हो न ! सुधा गोयल ‘नवीन’ 0

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8 मार्च

  1 स्त्री बढ़ रही है, बदल रही है सब खुश हैं सब यानी समाज, पुरुष सूचना तंत्र इन सब मे स्वयं स्त्री शामिल नही है 2 स्त्री बदल रही है पुरुष खुश है खुश है कि वही बदल रही है पुरुष के अनुरूप स्त्री के अनुरूप पुरुष को नही बदलना पड़ा 3 स्त्री का…

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सुबह, दोपहर और शाम

सुबह, दोपहर और शाम दिसम्बर का अंतिम सप्ताह भारत के उत्तरी भाग में सिहरन, ठिठुरन, धूप की गर्मी, कम्बल और रजाई के मखमली अहसास और आग की तपन का होता है। और इसी महीने में आता है क्रिसमस का रंगीन त्यौहार। बाकी भारतीय पर्वों की तरह इसके दिन और महीने नहीं बदलते – यह हमेशा…

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भारतीय मुक्ति-संग्राम में प्रेमचंद साहित्य का योगदान !!

भारतीय मुक्ति-संग्राम में प्रेमचंद साहित्य का योगदान !! किसी काल-विशेष के साहित्य में उस युग की विशेषताएँ प्रतिबिंबित होती रहती है। उसमें मूल मानवीय प्रवृत्ति और जातीय सांस्कृतिक स्थितियों एवं सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों के चित्र भी देखे जा सकते हैं। यदि साहित्य समाज का दर्पण है तो इसमें देश तथा समाज की राजनीतिक स्थिति का विवरण,…

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दंगों के बाद

दंगो के बाद दंगो के बाद वाला आसमान काला होता है कालिख बहुत दिन तक गिरती रहती है समाज के सर दंगो के बाद खतरनाक होता है राजनीति करना दंगो के बाद की राजनीति लेकिन सबसे खतरनाक होती है एक जली इमारत दूसरी को देखती है पूछती है तुम्हे क्यों जलाया जली इमारत रुआंसी है…

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