गुरू एक पथ प्रदर्शक

गुरू एक पथ प्रदर्शक वैदिक काल से शुरू हुआ गुरूकुल का प्रचलन हुआ आवश्यक है गुरू सानिध्य गुरू का हो सुंदर आशीष संसार के हर उत्तम कर्म ज्ञान औ विद्या होये संगम जन्म लेता है मानव शिशु माता पिता पाये औ सीखे सांसारिकता का ज्ञान मिले पर बिन गुरू ना दिशा मिले अक्षर ज्ञान से…

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जीवन का सफरनामा

जीवन का सफरनामा मेरे साहित्यिक क्षेत्र में ही नहीं अपितु जीवन में भी जो प्रेरणापुंज हैं उनके लिए आज शब्दों के जरिये मन के हर कोने को खंगालकर जो भाव निकले उन्हें व्यक्त करने की कोशिश कर रही हूँ। मेरा जन्म दुर्ग(छग) में हुआ लेकिन मेरे मां पापा गाँव में रहते थे, तब वहां अच्छे…

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चीखती खामोशियाँ

चीखती खामोशियाँ उतारो ” साली”के सारे कपड़े और पूरी तरह निर्वस्त्र करके पेड़ पर बांध कर कोड़े से मारो , पंच परमेश्वर में से एक ने ये राय दी , ….तभी दूसरे ने कहा नही इसके मुँह काला करके पूरे गाँव मे घुमाया जाय , इसी तरह जिसके जो मन मे आया फैसला सुना रहे…

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कहां से कहां आ गए

कहां से कहां आ गए कौन थें हम हम वही थें जो ईंट और गारा के लिए झगड़तें थें पशुओं की तरह लड़ते थें रक्त के रंग को नकारते रहें अलग अलग सोचते और अलग अलग विचारते रहें आपसी संबंध हमारे एक दूजे को नीचा दिखाने पर तुले रहें हम कितने अच्छे और कितने भले…

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स्वागत गणतंत्र

स्वागत गणतंत्र स्वागतम सुमधुर नवल प्रभात, स्वागतम नव गणतंत्र की भोर, स्वागतम प्रथम भास्कर रश्मि, स्वागतम पुन:, स्वागतम और। जगा है अब मन में विश्वास, कि सपने पूरे होंगे सकल, कुहुक कुहकेगी कोयल कूक, खिलेगा उपवन का हर पोर। युवा होती जायेगी विजय, सुगढ़ होता जायेगा तंत्र, फैलती जायेगी मुस्कान, विहंसता जायेगा जनतंत्र। कल्पनाएं सब…

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जब टूट गया था बांध 

जब टूट गया था बांध  कहीं दूर आंखों की पुतलियों के क्षितिज के पार जब टूट गया था बांध उस रोज…. नमक… समुद्र हो गया था.. मन डूबा था अथाह जलराशि की सीमाहीन धैर्य तोड़ती सीमाएं एक सीप के एहसासों के कवच में जा समायी थी और जन्म हो गया था एक स्वेत बिंदु मोती…

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मुक्तिधन

मुक्तिधन प्रेमचंद की हर कहानी अपने आप में बेजोड़ है। कोई न कोई सामाजिक संदेश उसमें छिपा ही होता है। लेकिन पिछले बरस भिन्न-भिन्न समुदाय के लोगों के गौमांस खाने संबंधी स्वीकारोक्तियों पर हिंदुस्तान जितना उबलता जाता था, मुंशी प्रेमचंद की लिखी ‘मुक्तिधन’ कहानी मेरे दिल को उतना ही ज्यादा याद आती गई । इस…

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हिन्दी फिल्में और हिन्दी का प्रसार

हिन्दी फिल्में और हिन्दी का प्रसार कहते हैं कि राजनीति, फिल्में और क्रिकेट — हम भारतवासियों का अस्सी से ज्यादा समय इनकी चर्चा करने में ही बीतता है। इन तीनों ने देश को कभी तोड़ा भी है और बहुत कहीं जोड़ा भी है। फिल्मों का तो भारतीय जीवन में और उनके मानस पटल पर बहुत…

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दिव्या माथुर का ‘आक्रोश’

दिव्या माथुर का ‘आक्रोश’ नेहरु केन्द्र के एक दूसरे कार्यक्रम के दौरान दिव्या ने मुझसे पूछा कि तुम्हें मेरी किताब पढ़ने का मौक़ा अभी मिला है कि नहीं? अट्ठारहवीं शताब्दी के अंग्रेज़ लेखक रेवरेंड सिडनी स्मिथ के एक प्रसिद्ध कथन के अनुसार, किसी पुस्तक की समीक्षा बड़ा घातक हो सकता है। मेरे दिव्या के आक्रोश…

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