भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की- कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव

परमवीर-कैप्टन योगेंद्र सिंह यादव हम कहते हैं आजादी हमें देश के नेताओं ने नागरिकों ने, क्रांतिकारियों ने, समाज सुधारकों ने, अहिंसा  के पुजारियों ने, अपना लहू बहाकर, तन-मन -धन न्योछावर करके दिलवाई है। लेकिन कभी हमने सोचा कि यह आजादी सदा यूँ ही बनी रहे,  अक्षुण्ण रहे और हमारे देश का तिरंगा नील गगन में…

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जागृति

जागृति हरसिंगार के छोटे छोटे फूल पेड़ों के नीचे गलीचा से बिछ गए हैं उनके फूलों की भीनी खुशबू से हवा मदमस्त ! और मदमस्त हवा अपने झोंके में गूंजते मंत्रोच्चारण को जैसे झूला झूला रही, दुर्गा मां का आगमन जो हो गया है, ढाक की आवाज आरती मेें बजती घंटियां, पावन कर रही हैं…

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और भेड़िया सच में आ गया

और भेड़िया सच में आ गया “क्याआ आ–! सच में!, ऐसा कैसे हो सकता है? दो दिन पहले तो मैं शुभ्रा से मिली थी, परेशान थी वह लेकिन इतनी भी नहीं कि इतना बड़ा कदम उठा ले और वैसे भी वह हमेशा छोटी छोटी बातों को लेकर शिकायत कारती ही रहती थी।” “लेकिन यह सच…

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मेरी माँँ

मेरी माँँ माँ की ममता की छाँव है माँ की आवाज दिल का सुरुर है माँ की मौजूदगी दिल का सुकून है माँ की मुस्कुराहट फूलों की खुश्बू है माँ का दुख दिल का लहू है माँ की ममता प्यार का साया है माँ के पैरों के नीचे सारा जहाँ है माँ का साया सघन…

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नारियाँ

नारियाँ नित हौसलों के दीप जलाती हैं नारियाँ हर फर्ज अपना हँसके निभाती हैं नारियाँ मुश्किल में हार मानती नहीं है ये कभी जो ठान लें वो करके दिखाती हैं नारियाँ कमजोर इनको आप समझना न भूलकर काँधे पे घर का बोझ उठाती हैं नारियाँ अब लक्ष्य इनका चार दिवारी नहीं रहा दुनिया मे नाम…

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साथी हाथ बढ़ाना !

साथी हाथ बढ़ाना ! श्रमिक हमारी सभ्यता-संस्कृति के निर्माता भी हैं और वाहक भी। हजारों सालों तक मनुवादी संस्कृति ने उन्हें वर्ण-व्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर रखा। उन्हें शूद्र, दास और अछूत घोषित कर उनके श्रम को तिरस्कृत करने की कोशिश की गई। सामंती व्यवस्था ने गुलाम और बंधुआ बनाकर उनकी मेहनत का शोषण…

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ओह, पुरुष क्या तुम नहीं जानते?

ओह,पुरुष “ओह, पुरुष क्या तुम नहीं जानते?” ओह, पुरुष क्या तुम सुनते नहीं हो, तुम्हारी पत्नी कई आँसू रो रही है! ओह, पुरुष क्या तुम देखते नहीं हो तुम्हारी पत्नी कई डर छुपा रही है! ओह, पुरुष क्या तुम्हें महसूस नहीं हो रहा तुम्हारी  पत्नी सुरक्षा के लिए तरस रही है! ओह, पुरुष क्या तुम्हें…

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वेलेंटाइन डे

वेलेंटाइन डे सफर के दौरान मिले दो शख्स ट्रेन में बैठे उदय…ने सामने सीट पर बैठी लड़की से पूछा…”कहाँ जा रही हो?” गुस्से में लाल चेहरे से तमतमाती लड़की ने जवाब दिया,”पता नहीं “। “टिकेट कहाँ की कटाई हो?” “जहाँ ट्रेन रूकेगी, मेरी किस्मत मुझे जहाँ ले जाए”।लगता है बहुत परेशान हो…? उचित समझो तो…

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मेरा परिचय

मेरा परिचय कहाँ- कहाँ देखूँ निज छवि अपनी, किस-किस से बाँधू निज परिचय मैं? कहाँ-कहाँ ढूँढू निज आधार अपना, किस -किस के आगे शीश नवाऊँ मैं? दिया अस्तित्व को स्वरूप जिन सबने, कहता है मन सबको, निजपोषक अपना। परिचयदात्री स्नेह-धूप में बनी मेरी हर परछाई, वह घना बरगद जिसकी छाँव तले जीवन सुस्ताई। परिचय देती…

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