सबसे बड़ी पराजय

सबसे बड़ी पराजय सरिता से हमारा परिचय फेसबुक पर ही हुआ था।वह हमारें उन तमाम मित्रों में से एक थी,जो फेसबुक की सूची में थे और पोस्टों पर लाइक या कॉमेंट कर देते थे।व्यक्तिगत एक दूसरे को नहीं जानते थे।लड़कियों के मामले में मैं अपनी ओर से संकोचशील ही रहता था;यानी येन केन प्रकारेण,जल्दी जल्दी…

Read More

हम अब भी आज़ाद नहीं….

हम अब भी आज़ाद नहीं…. आज़ाद हो गया है भारत, हम अब भी आज़ाद नहीं, फल-फूल रहे मुट्ठीभर लोग, सारे हुए आबाद नहीं। है कहां सुरक्षित अब भी, मेरे भारत की हर बाला, वासनांध दुष्‍टों ने जिसका, जीना दूभर कर डाला, अंधेरा रात सा हिस्‍से में आया, हो सका प्रभात नहीं आज़ाद हो गया है…

Read More

मेरा परिचय

मेरा परिचय कहाँ- कहाँ देखूँ निज छवि अपनी, किस-किस से बाँधू निज परिचय मैं? कहाँ-कहाँ ढूँढू निज आधार अपना, किस -किस के आगे शीश नवाऊँ मैं? दिया अस्तित्व को स्वरूप जिन सबने, कहता है मन सबको, निजपोषक अपना। परिचयदात्री स्नेह-धूप में बनी मेरी हर परछाई, वह घना बरगद जिसकी छाँव तले जीवन सुस्ताई। परिचय देती…

Read More

वसंत की नायिका

वसंत की नायिका वह कहता है कि उसकी हसरतें अक्सर लज़्ज़ित हो जाती है जब ह्र्दयरूपी मंच में उसके प्रेम या इश्क़ को एक मर्यादित स्थान देने की बात करती हूँ।सिर्फ़ इतना कह की तुम्हारी सौम्यता कोई भी परिधि नही लाँघ सकती। उसकी पहले से ही सिकुड़ी आँखे थोड़ा और संकुचित हो जाती है मेरी…

Read More

पहली मुलाकात

पहली मुलाकात प्रेम आकर्षण है, एक एहसास और समर्पण है l दुनिया में आप हजारों लाखों लोगों से मिलते हैं परंतु किसी एक के आ जाने से आप की दुनिया ही बदल जाती है l यह एहसास मुझे भी हिला गया था l मैं बचपन से ही बहुत बिंदास बेपरवाह स्वभाव की थी, मेरे मस्त…

Read More

डॉ. अंबेडकर

डॉ. अंबेडकर अंबेडकर एवं भारतीय संसदीय प्रणाली पर उनके विचार !! अंबेडकर ने कहा था कि भक्ति या नायक पूजा शर्तिया तौर पर पतन और उसके संभावित तानाशाही की ओर ही ले जाती है। भारत में भक्त होना आसान है समझदार होना मुश्किल है। क्या इस देश में भूख, बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक असामनता जैसे ज्वलंत…

Read More

गाँधी गुब्बारे वाला

गाँधी गुब्बारे वाला वो देखो देश के कर्णधारो, गाँधी गुब्बारे वाला! चला आ रहा है, फट फटिया पर, बिन लाठी और लोटा, अरे यह तो विद्वान विचारक राष्ट्र पिता हुआ करता था! व्यवसाय बदलकर विक्रेता क्यों बना? वो भी गुब्बारों का? हाँ पूछा था मैंने जुटाकर हिम्मत तो, बेचारा बिफर पड़ा, और कहने लगा, मेरी…

Read More

अरे! जरा संभल कर

अरे! जरा संभल कर अँधेरी गलियों के स्याह- घुप्प अंधकार में, आशंकित- भयभीत ह्रदय ढूँढेगा तुम्हारा हाथ, पकड़ जिसे मैं चुभते पत्थरों पर, चलने में लड़खड़ाने पर, गिरफ्त को और महसूस करूँ कसता हुआ, इन शब्दों के साथ,”अरे! जरा संभल कर।” जब कोरों से झाँकते बूँदों को, तुम संभाल लो अपनी हथेलियों में, फिर बना…

Read More