हिंदी साहित्य में ग्रामीण लोकप्रिय और कालजयी कहानियां

हिंदी साहित्य में ग्रामीण लोकप्रिय और कालजयी कहानियां आज 14 सितंबर यानी हिंदी दिवस है। हिंदी दिवस मनाने का औचित्य हिंदी के उपयोग को और अधिक बढ़ावा देने से पूर्ण होता है। हिंदी साहित्य अपनी सभी विधाओं में इतना समृद्ध है कि यहां पर उन सबका एक साथ जिक्र कर पाना संभव नहीं होगा। इसलिए…

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संकल्प

संकल्प दीपू ज्यादातर विद्यालय में देरी से ही पहुँचता थ। देर से आने वाले बच्चों की अलग लाइन बनवाई जाती है तथा उनका नाम भी उनकी कक्षा के अनुसार लिखा जाता है ताकि उनके कक्षाध्यापक उन्हें जान सकें और समझा सकें ।उस रजिस्टर में नवीं कक्षा में पढ़ने वाले दीपू का नाम एकाध दिन छोड़कर…

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हमारी लड़ाई

हमारी लड़ाई नर्स आकर जब कुलवंती के कान में यह कहने लगी तो कुलवंती को मूर्छा आ गई| उसका पूरा शरीर कांपने लगा| … “यह क्या हुआ” कहते हुए वह थहरा कर बैठ गई | कुलवंती को दांत लग गया| नर्स अपना पूरा जोर लगा कर कुलवंती को पकड़ कर सामने पड़े ओसारे के पर…

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मेरी प्रिय, प्रथमा

मेरी प्रिय, प्रथमा ” हमारी सभ्यता, साहित्य पर आधारित है और आज हम जो कुछ भी हैं, अपने साहित्य के बदौलत ही हैं।”- यह उद्गार है महान साहित्यकार प्रेमचंद का, जो उनकी रचनात्मक सजगता और संवेदनशील साहित्यिक प्रेम को दर्शाता है। प्रेमचंद हिंदी साहित्य का एक ऐसा नाम है, जिसने हिंदी कथा लेखन के संपूर्ण…

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काश !

काश! विमान मिलान ऐयरपोर्ट से टेक ऑफ कर इटली की सीमा को छोड़कर भारत की ओर बढ़ चुका था | विशाल और श्यामली दोनों बहुत खुश थे | भारत पहुँचकर सबसे मिलने की कल्पना मात्र से उनका मन उमंग से भर उठा था | पिछले पाँच सालों से वे अपने घरवालों से नहीं मिले थे…

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एक प्रेम ऐसा भी…

एक प्रेम ऐसा भी… “सात समुंदर पार से राजकुमार आएगा तुझे ब्याहने.. फिर, सफेद से घोड़े पर बैठा कर ले जाएगा मेरी प्यारी बिटिया को”– दादी यही कहकर बचपन में खाना खिलाया करती थी। “दादी उस राजकुमार का क्या नाम होगा..?” बड़ी- बड़ी आँखें निकालकर हलक में भोजन का एक कौर निगलती हुई पूछा करती…

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भाषा किसकी है?

भाषा किसकी है? 14 सितम्बर यानी ‘हिंदी दिवस’ फिर आने वाला है। इस कोरोना महामारी में कहाँ नया बैनर बनेगा? पिछले साल के बैनर में 2019 में केवल 19 को 20 करके काम चलाया जा सकता है, पर्यावरण की दृष्टि से संसाधन भी बचेगा, दफ्तर के बड़े बाबू ने सोचा। हर साल की गिनी-चुनी प्रतियोगिताएं…

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बड़े घर की बेटी

बड़े घर की बेटी भारतीय समाज में भारतीय संस्कारों को सही स्वरूप में जन मानस के समक्ष लाने में मुंशी प्रेमचंद के अवदान को हम “मील का पत्थर” मानते हैं । उनका साहित्य उस आम समाज की कहानी कहता है जो रहता तो हर काल में है परन्तु उसे कलम बद्ध करना अपनी जिम्मेदारी समझी…

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बदलाव बचाव के लिए

बदलाव बचाव के लिए हर जगह कोरोना वायरस का ही नाम है। इसकी अभी कोई भी दवाई नहीं इजाद की गई है ।पहले भी वायरस हुआ करते थे। कुछ मजबूत वायरस जैसे कि चिकन पॉक्स और पोलियो की हुए हैं जिन्हें खत्म करने में सालों लग गए और उनकी वैक्सीनेशन तैयार हो पाई। इसी तरह…

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