माँ

मां ममता,प्रेम, समर्पण,स्नेहिल संबंधों का आधार हो मां माया,ममता,खुशियां और शीतल छांव तुम हो मां तुम हो मां तो सारी खुशियां सारी मिल जाती है मां की छाया में आकर शीतल छांव मिल जाती है तेरी आलिंगन में आकर मां दर्द सारा मिट जाता है मैं से हम होकर ये दिल सचमुच खिल जाता है…

Read More

गुलाब

गुलाब फूलों का ये राजा है सबके दिल को भाता। प्यार बांटता सारे जग को कांटों में मुस्काता। लाल गुलाबी नीले पीले कितने रंग तुम्हारे। प्यार बढ़ाते तुम आपस में सबका दिल हर्षाता।। सबके मन के बगिया में तुम प्यार खिलाते हो। मनमोहक रंगों में खिल कर सबको भाते हो। मन का भौरा गुनगुन करता…

Read More

कील

कील बाहर खिली – खिली धूप को देखते ही उसका मन बाहर जाने को मचल उठा ।उसने अपने पैटीओ से बाहर गार्डन में देखा पेड़ भी शांत थे लगता था वह भी चमकती धूप का आनन्द ले रहे थे । धूप से घास पर पड़ी ओस भी यूँ चमक थी मानो प्रकृति ने चमकते हीरों…

Read More

झूठ झूठ और झूठ-झूठ के माध्यम से सच की तलाश

झूठ झूठ और झूठ-झूठ के माध्यम से सच की तलाश ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है कि कोई कवि या कवयित्री एक ही विषय को लेकर एक पूरा संग्रह ही रच डाले। दिव्या माथुर इस माने में एक अपवाद मानी जा सकती हैं, जिन्होंने ‘ख़याल तेरा’, ‘रेत का लिखा’, ‘11 सितम्बर – सपनों की…

Read More

चाँद जाने कहाँ खो गया

चाँद जाने कहाँ खो गया ग़ुल खिले और कलियाँ हँसीं,बाग फिर ये जवां हो गया तितलियों की जो देखी अदा भँवरों को फ़िर नशा हो गया तेरे होठों ने कुछ न कहा , मुझसे भी तो कहा ना गया। क़िस्सा तेरे मेरे इश्क़ का ख़ुद ब ख़ुद ही बयां हो गया।। एक अहसान मुझ पे…

Read More

बड़े घर की बेटी

बड़े घर की बेटी ‘बड़े घर की बेटी’ सामाजिक जीवंतता की एक कालजयी रचना है। मुंशी प्रेमचंद की कहानियां सीधी-साधी होती हैं और सामान्य ढंग से बातें करती हैं। इस कहानी में के चरित्र आने स्वाभाविक रूप में हैं और कथाकार ने कहीं भी भाषा कौशल या अभिव्यक्ति चतुराई का प्रयोग नहीं किया है। इन्हीं…

Read More

समय

समय आदिकाल से भविष्य का चक्र। हर होने से, न होने का नियम, जो है उसके ख़त्म होने का संयम । अदि, अंत, अनंत। देव, मानव,पाताल लोक का विभाजन, सागर मंथन भेद से सर्व लोक समीकरण ।। युग निर्माण, समाज परिवर्तन । सत्य,त्रेता, द्वापर से कलि का बदलाव, रामराज्य में सीताहरण, कलि में सती का…

Read More

मज़दूर की बेटी 

मज़दूर की बेटी विनायक अंकल आप मेरे पापा बनोगे? शैली के अप्रत्याशित सवाल से बुरी तरह से हड़बड़ा गए थे विनायक जी अरे बेटा मै तुम्हारे पिता जैसा ही हूँ ख़ुद को संयत करते हुए विनायक जी ने ज़वाब दिया। पिता जैसा होने में और पिता होने में काफ़ी फर्क़ होता है अंकल शैली की…

Read More

अपनेपन का पुष्प खिलाये रखना

अपनेपन का पुष्प खिलाये रखना समय की विषम आंधियों में आस का दीप जलाए रखना अपने उपायों और खूबियों से भारत को बचाये रखना धरती देखो नभ देखो हे ईश्वर! इस कहर से बचाए रखना हे लाड़लों! हम साथ है ये विश्वास बचाये रखना चलो साथियों एकजुट हो इस दानव से जिंदगी की जंग चलाए…

Read More

उम्मीदें इन्द्रधनुषी हुईं

उम्मीदें इन्द्रधनुषी हुईं एक एक अजीब सी सिरहन हुई ,और गुदगुदी भी, उस दिन शिंदे की तस्वीर देखी अखबारों में।गले में लालचारखाना गमछा,पाँव में बूढे चप्पल ,गोदी में , हरी साड़ी ब्लाउज में,चलने में लाचार बूढ़ी मौसी।बीवी,दो बच्चे और एक अंधी बहन का भार,फोटो के नीचे का दो लाइन वाला कैप्शन ढो रहा है।पीछे लम्बा…

Read More