उम्मीदें इन्द्रधनुषी हुईं

उम्मीदें इन्द्रधनुषी हुईं

एक

एक अजीब सी सिरहन हुई ,और गुदगुदी भी, उस दिन शिंदे की तस्वीर देखी अखबारों में।गले में लालचारखाना गमछा,पाँव में बूढे चप्पल ,गोदी में , हरी साड़ी ब्लाउज में,चलने में लाचार बूढ़ी मौसी।बीवी,दो बच्चे और एक अंधी बहन का भार,फोटो के नीचे का दो लाइन वाला कैप्शन ढो रहा है।पीछे लम्बा रास्ता छोड़ा,पर अपनों को नहीं ,अकोला अभी भी बहुत ,बहुत दूर जाना है…पर दूरी से भी दुगनी है अपनों के साथ गांव-घर ,घर जाने की जिद्द।कसकर ,मजबूती से मौसी को पकड़े शिंदे की हाथों का लॉक-ईन,सभी लॉकडाउन तोड़, उम्मीदें इन्द्रधनुषी कर दी।ठीक उसी तरह जैसे प्रेमचंद की “ईदगाह” में ईद के मेले से चार पांच साल के हामिद ने
अपने लिए खिलौने नहीं,बल्कि अपनी दादी के लिए चिमटा खरीदा , “तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैने इसे लिया।”

दो
“ईदगाह” का हामिद,”चार-पांच साल का ग़रीब-सूरत , दुबला-पतला लड़का जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और मां न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई.” हमारे शिंदे पर पड़ी नॉवल कोरोना वायरस
की मारथा दिहाडीदार ,लॉकडाउन ने उड़ा दी रोजगार तो होकर मजबूर आपनो के संग पैदल ही चल पड़ा ।

इधर,”सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद,उसके अब्बाजान रुपए कमाने गए हैं। बहुत-सी थैलियां लेकर आएंगे। अम्मीजान अल्लाह मियां के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीज़ें लाने गई हैं, इसलिए हामिद प्रसन्न है.आशा तो बड़ी चीज़ है, और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राई का पहाड़ बना लेती है।”

कुछ ऐसी ही काल्पनिक खुशियों की रंगीन आशाओं को लिए बरसों पहले, अपने जैसे सैकडों के संग अपना शिंदे, अकोला छोड़,सपनों की महानगरी मुम्बई आया था। हामिद के सजीव वर्णन, “पांव में जूते नहीं हैं, सिर पर एक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटाकाला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है”का हुबहु आइना है हमारा शिंदे ,ऐसे कमाल की थी प्रेमचंद की कलम!तो तीन ही पैसों ने दिखाया अपना रंग और चिमटा बन गया “रूस्तम-ए-हिन्द ” “और सभी खिलौनों का बादशाह”।
शिंदे की पीठ पर मौसी और हामिद के कंधे पर बंदूक जैसा चिमटा,दोनों ही से उम्मीदें इन्द्रधनुषी हुईं..वाकई भावनाओं के बंधन गरीबी से अछूते रहते!
पर प्रेमचंद की जादुई सृजन और कलम लाती है एक और मोड़ कहानी में ।”और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई।हामिद के इस चिमटे से भी विचित्र।

बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएं देती जाती थीऔर आंसू की बड़ी-बड़ी बूंदे गिराती जाती थी।हामिद इसका रहस्य क्या समझता”
हमारे शिंदे की पीठ पर ,चलने में लाचार बूढ़ी मौसी की तस्वीर से भी ज्यादा विचित्र बात ये हुई कि सबके दिलों का शिंदे बन गया बादशाह,रिश्तों को बखूबी निभाने का,हिम्मत न हारने का,वैश्विक महामारी का न सिर्फ पूरे जोशसे सामना करने का,पर निराश,थकी हुई उम्मीदों
को फिर से इन्द्रधनुषी करने का।शिंदे बन गया रूस्तमें-हिन्द इन सब का।

ठीक उसी तरह जैसे “हामिद इसका रहस्य क्या समझता”, शिंदे भी से,अपने नए साम्राज्य से पूरी तरह अनभिज्ञ,चलता गया।याद रखिए कि हामिद मात्र कथाकार का एक पात्र था,मनगढ़ंत। शिंदे,उसी कथाकार का,एक जीता जागता हकीकत!

सादर नमन,ऐसे महान साहित्य सम्राट को!

कविता झा
प्रधान मुख्य आयकर आयुक्त
एन.ई.आर

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