पहली कविता

पहली कविता बचपन के भावाें को सहेज अपने नन्हें हाथाें से लिखी मैने तितलियाें पर एक कविता । खुशी से थिरकती ,उछलती पहुॅंची पिता के पास कहा- पिता देखाे मैंने की है रचना लिखी है मैने कविता , पिता ने हॅंसकर माथा चूम लिया कहा,मेरी लाड़ली है यह मेरी प्यारी सुन्दर कविता । यह सुन…

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आशा

आशा जीवन में अंधकार हो चहूँ और अविकार हो तुम आशा का दामन थामे रखना बिजली कड़कड़ाये या मेघ गरजें सूरज की हो तपिश या आस्माँ बरसे तुम आशा का दामन थामे रखना हर तरफ़ चीत्कार का है मंज़र इंसान क़ैद में कैसा है ये क़हर तुम आशा का दामन थामे रखना ऑक्सीजन का कालाबाज़ार…

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भागलपुर मेरी यादों में

भागलपुर मेरी यादों में गंगा किनारे बसा भागलपुर बिहार का एक साधारण सा शहर पर मेरे लिए बेहद महत्व पूर्ण …..मेरे पापा माँ की शादी भागलपुर में १९५९ जून में हुई थी जब नाना वहाँ मजिस्ट्रेट थे .पापा की पहली नौकरी टी एन बी कोलेज भागलपुर में ही हुई और उनकी पहली संतान यानि मेरा…

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वेलेनटाईन-डे और करफ़्यू

वेलेनटाईन-डे और करफ़्यू आज वेलेनटाईन-डे के अवसर पर भावनाओं में महकती है भीनी भीनी ख़ुशबू जिस्म-व-जान में दोड़ती है एक मदहोश लहर आत्मा के झरोखों से आने लगती है स्वर्ग की सुगन्धित पवन इस दिन की प्रतीक्षा थी पूरे वर्ष कि मिलन का अवसर मिल जाए किसी रेस्टुरां के काफ़ी टेबल पर खोल देते हम…

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सपनों के आगे

सपनों के आगे सफलता या समस्‍या – दोनों एक ही सिक्‍के के दो पहलू हैं शायद। और दोनों ही हमारे कर्मों के फल हैं। कर्म पर निर्भर होता है कि हम खुशियां लाते हैं या फिर और कुछ। कर्म का मतलब है कि अपने आप के लिए तुम ही उत्‍तरदायी हो। कृष्‍ण ने तो अर्जुन…

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श्रद्धांजलि

योग्यता का सम्मान अमीर गरीब शिक्षित अशिक्षित योग्य अयोग्य रोजगार बेरोजगार कर्मण्य अकर्मण्य शोषक शोषित शासक शासित स्वामी सेवक दो ही रूप विद्यमान हैं इस संसार में सदियों से इसी चक्र में समाज का हुआ विकास भी और कालक्रमानुसार विभक्त हो गया समाज कई टुकड़ों में उन्नत होते गई अज्ञानता से आत्याचार शोषण कुप्रथा संकीर्ण…

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यू आर माय वैलेंटाइन

यू आर माय वैलेंटाइन मैं और तुम दो अलग अलग चेहरे दिल शरीर जान आत्मा व्यक्तित्व परिवार दोस्त वातावरण फिर भी हम ऐसे एक दूसरे मे यूं समाहित हुए मेरा सब कुछ हुआ तेरा तेरा सब कुछ हुआ मेरा तेरा मान सम्मान स्वभिमान सुख दुःख सफलता धन सम्पत्ति परिवार जिम्मेदारी हुई मेरी और मेरी हुई…

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दिव्या जी को जितना मैंने जाना

दिव्या जी को जितना मैंने जाना मिलना मिलाना कहते हैं ईश्वर के हाथों का खेल है और जीवन के किस मोड़ पर किसी ऐसी शख्सियत से भेंट करवा दें कि लगे जैसे आपको तो बहुत पहले से जानते हैं| प्रवासी हिंदी साहित्य लेखन की प्रतिनिधि साहित्यकार जिनका रचना संसार बहुआयामी है, सुश्री दिव्या माथुर जी…

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“कलम आज उनकी जय बोल “

“कलम आज उनकी जय बोल “ प्राण हाथों मे हैं लेकर रहते निडर दुश्मन से भीड़ हैं जाते रक्षा थल वायु जल में करते देश पे जान न्यौछावर जय बोल कलम आज उनकी जय बोल दृढ़ संकल्प वीरता भाषा उनके त्याग तपस्या से वे ना मुख मोड़े निश्छल जीत उनके मन लुभाये माता भारती उनके…

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