आजादी

आजादी ———– मुस्कुराती हुई हवाऐं, घाटी कश्मीर से आ रही। मुक्त हुई हूँ ,आज, हो स्वच्छंद बह रही। नयी भोर में उदित, सूर्य ये कह रहा, खुलकर लो प्रकाश, ना कोई रोकने वाला। कई बेड़ियाँ टूट गई, जन्नते कश्मीर की। ना आतंक ना भय होगा। पावन पवित्र जन्नत होगा। शिक्षा,धन,दौलत से, ये शहर पूरित होगा।…

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दो अक्टूबर के कुछ अनछुए पहलू

दो अक्टूबर के कुछ अनछुए पहलू राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का नाम सिर्फ साबरमती आश्रम से ही नहीं जुड़ा है ।यह बात शायद काफी लोगों की जानकारी से अछूती हो सकती है। बात कुछ यूं निकली और जब मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में बुजुर्गों के बीच सिमट कर रह गई। बापू का लगाव और…

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वर्तमान साहित्य में स्त्री उत्थान क्यों और कैसे ?

  वर्तमान साहित्य में स्त्री उत्थान क्यों और कैसे ? साहित्य के संदर्भ में चाहे अतीत हो या वर्तमान अथवा भविष्य। उत्पीड़ा की एक त्रासदी होती है। अतीत हमेशा भुक्तभोगी पीड़ाओं से गुज़रता है, तो वर्तमान आशादायी भविष्य की ओर संकेत करता है। पीड़ा और त्रासदी में कोई परिवर्तन नहीं होता, केवल समय गतिशील होता…

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वही होगा मेरा पति

वही होगा मेरा पति कड़कड़ाती धूप में मेहनत करती यमुना पसीने से तर-बतर हो रही थी। तभी खाना खाने की छुट्टी हुई। इतने शरीर तोड़ परिश्रम के बाद उसे जोरों की भूख लगी थी। आज माँई ने क्या साग भेजा होगा, सोचते हुए उसने अपना खाने का डब्बा खोला। वह देखकर हैरान रह गई कि…

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बेबाकी और उन्मुक्तता का सशक्त स्वर : ममता कालिया

बेबाकी और उन्मुक्तता का सशक्त स्वर : ममता कालिया कुछ कहानियां श्रृंखलाबद्ध रूप में एक जगह एकत्रित मिली और जब पढ़ना शुरू किया तो पढ़ती ही चली गई । थोड़ा सा प्रगतिशील, अपत्नी, निर्मोही ,परदेशी, पीठ, बड़े दिन की पूर्व सांझ, बीमारी , कामयाब,बोलने वाली औरत ,मेला, आपकी छोटी लड़की इत्यादि-गजब का आकर्षण था कहानियों…

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हिंदी दिवस

हिंदी दिवस हिंद देश की हिंदी भाषा कितनी है आसान, सूरज जैसी बिंदिया है मेरे भारत की शान। बनाओ राष्ट्र भाषा, करें हम सब अभिलाषा। सबसे प्यारी सबसे मीठी हिंदी हिंद की आन, सूर कबीरा और रसखाना मीरा की पहचान। बनाओ राष्ट्र भाषा, करें हम सब अभिलाषा। भाषाओं की बड़ी बहिन है नहीं किसी से…

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बसंत बहार

बसंत बहार पीली सरसों पीले खेत बसन्ती छटा में रंगा धरती का परिवेश पवन सुगन्धित मन आह्लादित बसंत बहार सुनाये रे… पतंग रंगा, नीला आकाश “वो काटा” से गूंजा जाए अमराई बौरें झूम झूम डोलें मन मयूर बहका जाए रे… सरस्वती पूजन मन्त्रोच्चारण, कानों में शहद सा घुलता जाए हिय हुलसै,मन उडे बचपन की गलियों…

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लॉकडाउन के दौरान

लॉकडाउन के दौरान ( डायरी के कुछ पन्ने ) बचपन में ऐसी फिल्में देखकर जिसमें बच्चे अपने माता -पिता से बिछड़ जाते हैं देखकर बहुत डर लगता था और सोचती थी अगर माता पिता को कुछ होना है तो मुझे भी उनके साथ हो …आज सोचती हूँ मुझे कुछ होना है तो मेरे साथ मेरे…

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हेयर केयर- मानसून

गर्मी के बाद मानसून वाला मौसम सभी को बहुत सुहाना और रोमेंटिक लगता है। इस बारिश को देखते ही इसमें भीगने का मन करता है। लेकिन बारिश में भीगने से बालों को काफी नुकसान पहुंचता है क्योंकि यह मौसम बहुत चिपचिपा और ऑयली होता है। इसमें बाल बहुत जल्दी गंदे और ऑयली हो जाते हैं।…

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कस्तूरबा गाँधी से एक काल्पनिक मुलाकात

कस्तूरबा गाँधी से एक काल्पनिक मुलाकात खट्दर की साड़ी, ढँका हुआ सिर, माथे पर गोल बिंदी, कलाई में सादी चूडियाँ – इस छोटी दुबली — पतली महिला को देखकर विश्वास ही नहीं हुआ कि उसमें कितनी शक्ति समाहित है। उसकी उपस्थिति से ही कमरा जैसे जीवंत हो गया। कमरा खचाखच भरा हुआ है। सबके मन…

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