भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की- खुदीराम बोस

खुदीराम बोस

जीवन परिचय :

खुदीराम बोस का जन्म 03 दिसम्बर 1889 को बंगाल के मिदनापुर जिले के हबीबपुर गांव में त्रैलोक्यनाथ बोस के यहां हुआ था. उनकी माता का नाम लक्ष्मीप्रिया देवी था. केवल 6 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने अपने माता पिता को खो दिया था. उनका लालन पालन उनकी बहन करती थीं. सत्येन बोस के नेतृत्व में खुदीराम बोस ने अपना क्रांतिकारी जीवन शुरू किया. मात्र 18 वें वर्ष में हाथ में भगवद गीता लेकर हँसते-हँसते फाँसी के फंदे पर चढ़कर इतिहास रच था. कम उम्र में देशभक्ति का जज़्बा लिए, शहीद होने वाले क्रांतिकारियों में से वे एक थे. खुदीराम बोस को भारत की स्वतंत्रता के लिए संगठित क्रांतिकारी आंदोलन का प्रथम शहीद माना जाता है.

नाम से जुड़ा तथ्य:

खुदीराम के जन्म के बाद उनके माता-पिता बेहद डरे हुए थे क्योंकि खुदीराम बोस से पहले अपने दो बेटों को बीमारी की वजह से छोटी उम्र में ही खो चुके थे.इसलिए उन्होंने तय किया कि वो उन्हें अपनी ही बेटी को तीन मुट्ठी चावल में बेच देंगे. ये एक प्रकार का टोटका था ताकि खुदीराम बोस स्वस्थ रहे. उस समय मिदनापुर में चावल के लिए ‘खुदी’ शब्द का प्रयोग होता था, अतः उनका नाम खुदीराम बोस रखा गया.

देशभक्ति की ज्वाला:

मात्र नौवीं कक्षा तक आते आते बालक खुदीराम के मन में देश को आजाद कराने की ऐसी लगन लगी कि उन्होनें पढाई त्याग दी और स्वेच्छा से स्वदेशी आन्दोलन में आ खड़े हुए. अत्याचारी सत्ता चलाने वाले ब्रिटिश साम्राज्य को भारत से निकालने के लिए खुदीराम क्रांतिकारी पार्टी ‘रिवोल्यूशनरी पार्टी’ के सदस्य बन गए.

एक बार उन्होंने बोला था ‘क्या गुलामी से बड़ी और भद्दी कोई दूसरी बीमारी हो सकती है?’ इसीलिए 18 साल की उम्र में शेर सी दहाड़ करते हुए वे शहीद हो गए. उन्होंने एक स्वतंत्र और समग्र भारत का सपना देखा था. उस समय खुदीराम बोस ने देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने से पीछे नहीं हटे.

आंदोलन में उनकी भूमिका:

सन 1905 में बंगाल विभाजन के विरुद्ध चले आन्दोलनों में उन्होनें बढ़ चढ़ कर भाग लिया. उस समय के महान दार्शनिक श्री ऑरोबिन्दो घोष ने वंदे मातरम् नाम के समाचार पत्र से विदेशी सामानों की होली जलाने की खबरें प्रमुखता से छाप रहे थे और ये खबरें अंग्रेजों के खिलाफ लोगों को एकजुट करने का काम करती थीं. खुदीराम बोस ने वंदे मातरम् पर्चे वितरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. ऐसा करने के लिए एक पुलिस वाला उन्हें पकडने भागा। खुदीराम ने इस सिपाही को घूँसा मार और शेष पर्चे बगल में दबाकर भाग गये। इस प्रकरण में राजद्रोह के आरोप में सरकार ने उन पर अभियोग चलाया परन्तु गवाही न मिलने से खुदीराम निर्दोष छूट गये। खुदीराम बोस अपने साथियों के साथ अंग्रेजी अफसरों से छिप कर एकत्रित होते और आगे की योजनाएं तय करते.इतिहासकारों के अनुसार 28 फरवरी 1906 को खुदीराम को गिरफ्तार किया गया था लेकिन वे जेल से भाग निकले.


क्रांतिकारी हमले:

6 दिसंबर 1907 को खुदीराम ने नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की विशेष ट्रेन पर हमला किया परन्तु गवर्नर बच गया। सन 1908 में उन्होंने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और फुलर पर बम से हमला किया लेकिन वे भी बच निकले। मिदनापुर में ‘युगान्तर’ नाम की क्रांतिकारियों की गुप्त संस्था के माध्यम से खुदीराम क्रान्तिकारियों पहले ही एकजुट कर चुके थे.

मुजफ्फरपुर कांड:

वर्ष 1905 में लॉर्ड कर्जन ने जब बंगाल का विभाजन किया तो उसके विरोध में अनेक भारतीयों को उस समय के कलकत्ता के मॅजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड ने अति क्रूर दंड दिया, जिसमें क्रांतिकारियों को अतीव कष्ट मिले. इसके बाद उनको मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश का पद दे दिया गया.

किंग्जफोर्ड के किये अत्याचारों का बदला लेने के लिए, ‘युगांतर’ समिति की एक गुप्त बैठक में किंग्जफोर्ड को मारने का निश्चय किया गया. इस काम को करने के लिए खुदीराम तथा प्रफुल्लकुमार चाकी को चुना गया. मुजफ्फरपुर में आने पर इन दोनों ने सबसे पहले किंग्जफोर्ड के बंगले की, उनके आने जाने की बग्घी और जरूरी चीजों की निगरानी की. बताते हैं, कि खुदीराम तो किंग्जफोर्ड को उसके कार्यालय में जाकर ठीक से देख भी आए थे.

30 अप्रैल 1908 को दोनों ने दिए गए कार्य को अंजाम देने का निश्चय किया और किंग्जफोर्ड के बंगले के बाहर घोड़ागाड़ी से उसके आने की राह देखने लगे. रात में क्लब से किंग्जफोर्ड की बग्घी के समान दिखने वाली गाडी आते हुए देखकर खुदीराम गाडी के पीछे भागने लगे. रास्ते में बहुत ही अँधेरा था. गाडी किंग्जफोर्ड के बंगले के सामने आते ही खुदीराम ने अँधेरे में ही आने वाली बग्घी पर निशाना लगाकर जोर से बम डाला. भारत में इस पहले बम विस्फोट की आवाज उस रात तीन मील तक सुनाई दी और कुछ दिनों बाद तो उसकी आवाज इंग्लैंड तथा यूरोप में भी तहलके की तरह सुनाई दी गई. पर किंग्जफोर्ड बच गए क्योंकि उस बग्घी में अंग्रेजी मैडम और उनकी बेटी थे , जो हमले में मारे गए. हमले के बाद खुदीराम और प्रफ्फुल दोनों 24 मील दूर वैनी रेलवे स्टेशन पर जा कर रुके, पर अगले ही दिन उनको पकड़ने पुलिस आ गयी. प्रफ्फुलकुमार ने तो स्वयं को गोली मार कर शहादत ले ली. खुदीराम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया, जिसका अंत सभी जानते थे, मृत्यु ही था. साथ ही, किंग्जफोर्ड इस हमले से डर कर, सेवानिवृत हो गया और जिन क्रान्तिकारियों को उसने कष्ट दिया था उनके भय से उसकी शीघ्र ही मौत भी हो गयी.

अंतिम सज़ा और आदर्श:

13 जून 1908 को मुजफ्फरपुर मामले में फांसी की सज़ा सुनाई गई. पर खुदीराम बिलकुल दुखी नहीं हुए. ये देख जज ने हैरानी से पूछा “तुम्हें फैसला समझ भी आया या नहीं?” और खुदीराम का जवाब था “हाँ, लेकिन मैं कुछ कहना चाहता हूँ, अगर मौका दिया जाए तो मैं बता सकता हूँ की मैंने बम किस तरह तैयार किया था” जिस पर जज ने कहा उनके पास समय नहीं है. खुदीराम आगे की क्रांतिकारियों को आज़ादी के लिए प्रेरित करना चाहते थे, ताकि हर घर में बम बने और बहरे अंग्रेजी सरकार को सुनाई दे एक आवाज़ “आज़ादी”. ये आखिरी संवाद कई वषों तक याद रखा गया.

अनूठा तथ्य:

खुदीराम बोस के समर्थन में बाल गंगाधर तिलक ने भी कई लेख लिखे थे. इस के लिए उनको 1908-1914 तक राजद्रोह के लिए बर्मा की जेल में रखा गया था.

अंतिम विदाई:

11 अगस्त 1908 को हाथों में भगवद्गीता लिए, खुदीराम बोस के माथे पर शिकन न हो कर, देशभक्ति की ख़ुशी थी, और वे हस्ते हुए फाँसी पर चढ़ गए. इसके बाद खुदीराम बोस लोगों के बीच इतने प्रचलित हुए और इतने लोगों के मन में घर कर गए कि उनकी याद में बंगाल के जुलाहे एक खास किस्म की धोती बुनने लगे. वे प्रेरणादायी और अनुकरणीय हो गए विद्यार्थियों और आम जनता के बीच कि उनके मृत्यु के बाद कई दिन तक विद्यालय, महाविद्यालय बंद रहे. बंगाल के युवा, ऐसी धोती पहनने लगे, जिसकी किनारे पर खुदीराम बोस लिखा होता था. उन्होने असंख्य युवकों को स्वतंत्रता की क्रांति में भाग लेने के लिए प्रेरित किया और उनकी शहादत से सम्पूर्ण भारत में देशभक्ति लहार उमड़ पड़ी.

सम्मान:
उनके सम्मान में भावपूर्ण गीतों की रचना हुई जिन्हें बंगाल के लोक गायक आज भी गाते हैं.अपनी निर्भीकता और मृत्यु तक को साहस के साथ वरण करने के लिए वे आज भी घर-घर में श्रद्धापूर्वक याद किए जाते हैं.

अंकिता बाहेती
कतर

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