बहिष्कार

बहिष्कार गंगा किनारे एक बुजुर्ग महिला को देख ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई तपस्विनी देवलोक से तपस्या हेतु अवतरित हुई हों । शिला पर बैठे देख उनसे बात करने के लोभ को संवरण न कर सकी और उनके समीप मैं भी आँखे मूंद बैठ गयी । स्नेहिल स्पर्श महसूस कर मैं आँखे खोल अपलक…

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कुछ नया सा

कुछ नया सा अंजलि को जब भी घबराहट महसूस होती है, वह अपने नाखून चबाने लगती है। कितनी बार उसने यह आदत छोड़ने की कोशिश की, लेकिन जाने अनजाने यह हो जाता है। अविनाश ने कितनी बार टोका होगा – लेकिन आदत तो छूटती नहीं। अब यही देखो ना, अविनाश को भूलने की कोशिश भी…

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फूल का इंतजार

फूल का इंतजार आज फूल के कदम जमीन पर नहीं पड़ रहे थे | मिट्टी और ईट के उसके कच्चे पक्के घर में खुशियाँ इस तरह उतर आईं थीं | मानो सितारों की जगमगाहट उतर कर जमीन पर आ गई हो | हमेशा चिढ़ी सी रहने वाली दादी ने भी आज उसके गाल को चूमकर…

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अरमान

अरमान वो इंजीनियर थी, घर वालों ने कभी पढ़ने से मना नहीं किया। और वह मैट्रिक पास। वो अंग्रेजी बोल – पढ़ – लिख लेती थी और वह केवल टूटी-फूटी हिन्दी और तेलगू बोल लेता था। वो बिजनेस समझती थी, कहाँ क्या बोलना है, किससे क्‍या फायदा हो सकता है। वह सीधा था, सब पर…

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माँ

      ” माँ “ नभ से विशाल आँचल है माँ, ममता तुम ही कहलायी। स्पर्श मिला जब भी तेरा तो, स्नेह सिक्त  मैं  हो आयी। चरण वंदन करूँ मैं माँ, तूने ही सृष्टि रचायी। पूजनीय हम सबकी ही तुम, संतति में प्राण बसायी। दुलारा किया हरदम तुमने, सही राह भी दिखलायी। नभ से…

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Christmas Eve

Christmas Eve Long ago, in a far off land On a cool dark night A sudden music of choir grand A surprising wondrous sight! The angels delivered a message – A message to humankind A message in heavenly language From the heavenly Father kind: ‘Let there be Peace on earth Let humanity sing and rejoice…

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ग्रामीण संवेदनाओं का कुशल चितेरा मुंशी प्रेमचंद !!

ग्रामीण संवेदनाओं का कुशल चितेरा मुंशी प्रेमचंद !! साहित्य का उद्देश्य केवल लोगों को संदेश देना नहीं होता है। बल्कि श्रेष्ठ साहित्य तो अपने युग का जीता-जागता दस्तावेज होता है। उसमें उस कालखंड की समस्याओं, विशेषताओं, राजनीतिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों का विशद वर्णन होता है जिसे पढ़ कर पाठकों की अन्तःचेतना में एक नई…

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कजाकी

कजाकी मुंशी प्रेमचंद बहुत ही सहज सरल किन्तु असाधारण व्यक्तित्व के मालिक थे. वे अपनी हर कहानी को पहले अंग्रेजी में लिखते, उसके बाद उसका अनुवाद हिंदी और उर्दू में करते इस तरह तीनों भाषाओँ पर उनकी बराबर से पकड़ थी. उन्होंने अपने जीवन की साधारणता की और इंगित करते हुए कहा था की “मेरा…

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हमारी मातृ भाषा हिंदी

हमारी मातृ भाषा हिंदी हिन्दी हमारी मातृभाषा सरल ,सुन्दर और प्रभावशाली। समृद्ध भी है, साहित्य अपार है। फिर भी उपेक्षित, निम्न, और कंगाल है।अपने बच्चों द्वारा ही तिरस्कार है। अभिवादन, प्रशंसा, धन्यवाद सभी पर, विदेशी का अधिकार है। धीरे-धीरे घरों मैं बढ़ रहा इसका व्यवहार है। लिखित कथन अंग्रेजी वर्णमाला पर निसार है। यही प्रगति…

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मासिक धर्म को हीन दृष्टि से देखने वाले समाज में रोशनी के किरण बनते ये युवा

मासिक धर्म को हीन दृष्टि से देखने वाले समाज में रोशनी के किरण बनते ये युवा मासिक धर्म एक सामान्य प्रक्रिया है और प्रकृति की महिलाओं को देन है , महिलाओं को प्रकृति ने नव सृजन का जो वरदान दिया है वह मासिक धर्म के बग़ैर संभव नहीं है । परंतु उसी मासिक धर्म के…

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