बदल रही है भारत की तस्वीर

बदल रही है भारत की तस्वीर हमारा गणतंत्र -हमारी राष्ट्रीय एकता-सम्प्रभुता-और अस्मिता का एक गौरवशाली दिन, पूर्ण स्वराज्य की अवधारणा के साकार प्रतिफलन का एक उज्जवल क्षण , एक नई सुबह-जागृति की, विश्वास की,एकता व गर्व-बोध से भरे गणतंत्र की, हाथों में तिरंगे झंडे उठाये हजारों बच्चों की एक सम्मिलित आवाज ” भारत माता की…

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हरि अनंत हरिकथा अनंता

हरि अनंत हरिकथा अनंता तुलसीदास के ‘हरि अनंत हरिकथा अनंता’ की तरह ही विविध आयामी और नवों रसों से भरपूर रामकथा भारत ही नहीं, विश्व के कई देशों में प्रचलित है। असल में देखा जाए तो आदिकवि वाल्मीकि कृत रामायण में जिन-जिन स्थानों का उल्लेख है, भौगोलिक उन सभी क्षेत्रों में साहित्य और संस्कृति के…

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हिन्दी-दिवस

हिन्दी-दिवस तुम प्राण देश की हो “हिन्दी “पर हो तुम किस तरह उजड़ी? किसने उजाड़ा है तुमको? किसने संहारा है तुमको? विलुप्त सी हो चली हो तुम भारत धरा से विस्मृत हो कर तुमही तो भारत मनु की सतरूपा थीं जिसने किया था समर्पण एक दिन भारत मनु को अपना सर्वस्य देकर पर परतंत्रता के…

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सुंदर हाथ

सुंदर हाथ “मांँ दे ना अपनी हंसुली, उसे तोड़ कर तुम्हारी बहू के हाथ की चुड़ियां बनवा दूंगा…” सुनील ने गुटखा थूकते हुए कहा। “ऐसा कैसे चलेगा, कब तक तू मुझसे पैसे मांग – मांग कर अपने शौक पूरे करता रहेगा..” मालती देवी ने खीझते हुए कहा। “क्या करूं मांँ, नौकरी तो मिलने से रही,…

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न्याय

न्याय क्षितिज पर आषाढ़ के काले मेघ घुमड़ रहे थे. धरती और बादलों का मिलन बिंदु धुआँ धुआँ हो रहा था. बादल थे कि रह रह कर बरसने का उपक्रम कर रहे थे मानों अपना समूचा प्रेम आज ही धरा पर उड़ेल देना चाह रहे हों. ” तनिक देखो तो! कल कितनी तीव्र ग्रीष्म वेदना…

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आधी आबादी- पूरी आबादी की जननी

आधी आबादी- पूरी आबादी की जननी आधी आबादी पूरी आबादी की जननी है । पर फिर भी हर युग में इन्हें अपना स्थान बनाने और बचाये रखने में संघर्ष ही करना पड़ा है।खैर आज की परिस्थिति काफी अलग है या यों कहूं कि पहले से संतोषजनक है क्योंकि सुखद परिवर्तन हुआ है ।खैर…. संघर्ष आज…

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इसके बाद

इसके बाद महामारी बची आँखों को दे जायेगी भविष्य में देखने वाली तीसरी आँख कटेंगी हाथ की हथेली में समान्तर चलने वाली दो जीवन रेखाएँ अनिवार्य होगा भूख के अर्थशास्त्र में श्वाँसो का निवेश नये इतिहास में सर्वाधिक गतिशील होंगी वर्तमान के कारावास में बंदी तारीखें काट कपट के बीज से उगे उन्मादी विषैले फल…

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ओ नरभक्षी

ओ नरभक्षी 1. ओ विषाणु, सुन, तुझे रक्त चाहिए आ, आकर मुझे ले चल मैं रावण-सी बन जाती हूँ हर एक साँस मिटने पर ढेरों बदन बन उग जाऊँगी तू अपनी क्षुधा मिटाते रहना पर विनती है जीवन वापस दे उन्हें जिन्हें तू ले गया छीनकर मैं तैयार हूँ आ मुझे ले चल। 2 ओ…

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खुद को जानती हूँ मैं

“खुद को जानती हूँ मैं” ऐसा नहीं है कि– औरत हूँ तो बस नशा है मुझमें पत्नी हूँ,माँ हूँ,बहन हूँ– इक दुआ है मुझमें… ऐसा नहीं है कि– संगमरमर के साँचे में ढला जिस्म हूँ केवल नमी हूँ,आग हूँ,धरती,आकाश हूँ– जीने के लिए जरूरी हवा हूँ शीतल… ऐसा भी नहीं है कि– बस मुहब्बत, खुशबू,…

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