लंग कैंसर

      लंग कैंसर पुरी दुनिया में होने वाले कैंसरों में सबसे अधिक लंग कैंसर के रोगी ही होते हैं ।हमारा शरीर अनेक प्रकार के अलग-अलग कोशिकाओं से निर्मित है, साधारणतः हमारा शरीर आवश्यकतानुसार नई कोशिकाओं के उत्पादन को नियंत्रित करता है ,जब कुछ कोशिकाएँ उत्पादन की नियंत्रण से बाहर हो जाए, बदलना शुरू…

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शिक्षक

  शिक्षक जननी, प्रथम, सर्व श्रेष्ठ शिक्षक होती है अपनी, लिए गोद में पीना खाना है सिखलाती; नन्हें नन्हें पैरों से चलना है वो सिखलाती। अब बारी आती है उन शिक्षकों की, जो प्यारे प्यारे नौनिहाल को, सहनशक्ति बिन विचलित हुए क ख ग ए बी सी का पाठ पढ़ाते हैं, ख़ुद बच्चा बन बच्चों…

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सरस्वती वंदना

सरस्वती वंदना अंधकार जब अम्बर पर छाये नव पल्लव नव उपमा लेकर ….माँ !तू आये …. निराशा के घोर भँवर में फंस जाये नया उत्साह नई उमंग लेकर ….माँ!तू आये ….. कठिन डगर चलना मुश्किल हो जाये नई शिक्षा का संचार लेकर ……माँ!तू आये… सुख समृद्धि की प्रबल कामना पूर्ण न पाये नई दिशा का…

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अपनी शक्ति पहचानो

अपनी शक्ति पहचानो निर्भया ! अब जागो डरो नहीं, तुम उठो अपनी शक्ति पहचानो कब तलक दामिनी सी अपना मुँह छुपाओगी कोई राम हनुमान नहीं आएँगे बचाने वानर सेना भी तुम बना नहीं पाओगी कृष्ण भी चीर ना बढ़ाएगा राम के रहते भी हरी गई थी सीता दुःशासनी दुनिया में अंधे तो थे ही अब…

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भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की-वी वी गिरी

भारत रत्न वी.वी. गिरी वी.वी. गिरी का पूरा नाम वराहगिरी वेंकट गिरी था। यह भारत के राजनेता थे और देश के तीसरे उपराष्ट्रपति पद पर तैनात रहे। भारत के चौथे राष्ट्रपति का पदभार भी इन्होंने संभाला था। हम सर्वप्रथम वी.वी. गिरी जी के जन्म और बचपन की बात करते हैं, गिरी जी का जन्म ब्रह्मपुर…

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मेडिकल समर्पित रक्त व साहित्य सुधा

“मेडिकल समर्पित रक्त व साहित्य सुधा” जिंदगी का सफर यदि खट्टे मीठे अनुभवों का पिटारा है , तो यादों के पन्ने होते हैं और फिर चलते चलते जीवन के उतार चढ़ाव में विधाता ने कुछ ऐसे मोड़ लिखे होते हैं,जिनके बारे में कल्पना में भी सोचा नही होता है।बचपन की यादें एक सुखद हँसी होंठों…

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बदला सावन

बदला सावन इस बार सावन, कुछ बदला-बदला है। ना उमंग है,ना तरंग है। लागे सब देखो वेरंग है। चारों ओर हाहाकार मचा है। मुँह खोल बिकराल खड़ा है इस बार सावन, कुछ बदला बदला है। बगियाँ फूलों से भरी, पर सूनी-सूनी हैं। ताल-तलैया तृप्त हुऐ, पर प्यासी-प्यासी हैं। इस बार सावन, कुछ बदला-बदला हैं। काले-काले…

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माँ

माँ मैंने कितना ही उसका दिल तोड़ा फिर भी वह मुझे दिल का टुकड़ा कहती रही मैंने कितना भी उसे बुरा भला कहा फिर भी वह मुझे सूरज चंदा कहती रही मैंने कितना ही उसे सताया फिर भी वह मेरी राहों के कंकड़-कांटे चुनती रही क्योंकि वह मां थी शक्ति भर उसने हर विपदा से…

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एक लड़की थी…

एक लड़की थी… शरारती किस्से वो फ़ोन पर सुनाया करती थी एक लड़की थी मुझे गोद में सुलाया करती थी बिन बाबा के कैसे बीती थीं उसकी माँ की रातें कुछ बेचैनियाँ थीं सिर्फ़ मुझे बताया करती थी डर मेरी उल्फ़त से था, कोई और पसंद था उसे इसी बात पर ज़्यादा खुद को रुलाया…

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