हार कभी न मानी

  हार कभी न मानी   राह कठिन है जीवन की पर हार नहीं मानी है. पर्वत-सी ऊँची मंज़िल पर चढ़ने की ठानी है. जीवन के पाँच दशक पार हो जाने के बाद जब अपने जीवन को एक द्रष्टा के तौर पर देखती और विश्लेषण करती हूँ तो लगता है एक व्यक्तित्व वस्तुतः अपने माता-पिता…

Read More

हाजी मियां

हाजी मियां   उनका नाम हाजी मियां था, पर उन्होंने कभी हज नहीं किया था । गरीबी की मिट्टी में पले उनके परिवार की एक ही तीर्थयात्रा थी ,रोटी का इंतजाम। शायद इसी स्थिति को भांप कर , उनकी दादी ने उनका नाम ‘हाजी’ रख दिया था , ताकि नाम सुनकर ही घर में काबा…

Read More

नई राष्ट्रीय शैक्षिक नीति और उच्च शिक्षा प्रणाली

नई राष्ट्रीय शैक्षिक नीति और उच्च शिक्षा प्रणाली नई राष्ट्रीय शैक्षिक नीति (NEP) 2020 भारत में शिक्षा के सभी स्तरों पर परिवर्तनों लागू करने का प्रयास है, जिसमें देश में शिक्षा की nai समझ- स्कूलों, कॉलेजों और शिक्षकों को प्रशिक्षित करने के दृष्टिकोण में बदलाव की आवश्यकता पर बल है एनईपी ने मानव संसाधन विकास…

Read More

मुख़्तसर सी बात है … तुमसे प्यार है

मुख़्तसर सी बात है … तुमसे प्यार है चैत के महीने पहाड़ी क्षेत्रों में घुर-घुर का राग अलापती घुघुती विरह का कोई लोकगीत सा गाती सुनाई पड़ती है। घुघुती हमारे उत्तराखंड की बहुत लोकप्रिय पक्षी है। गौरैया की तरह ही इंसानी आवास के आसपास रहना पसंद करती है। थोड़ा आत्मकेंद्रित भी,कि अगर खाने-पीने के लिए…

Read More

वेलेनटाईन-डे और करफ़्यू

वेलेनटाईन-डे और करफ़्यू आज वेलेनटाईन-डे के अवसर पर भावनाओं में महकती है भीनी भीनी ख़ुशबू जिस्म-व-जान में दोड़ती है एक मदहोश लहर आत्मा के झरोखों से आने लगती है स्वर्ग की सुगन्धित पवन इस दिन की प्रतीक्षा थी पूरे वर्ष कि मिलन का अवसर मिल जाए किसी रेस्टुरां के काफ़ी टेबल पर खोल देते हम…

Read More

सुहानी बारिश

सुहानी बारिश “मुनियाँ के दद्दा !…… सो गये का ?” पत्नी ने झिंझोड़ कर पूछा तो करवट ले कर उठते हुए रामदीन बोला …. “नहीं री नींद कहाँ आवेगी …. तीन दिनों से पानी पड़ रहो है ….. बच्चन के पेट में अन्न का दानों भी नहीं गयो । समझ नहीं आ रहो का करें”…

Read More

सपनों का भारत

” सपनो का भारत “ हो न अमन की कमी इस जहां में मिलजुल सब रहें इस जहां में हर विस्थापितों को मिले आशियाना रहे अनाथ ना कोई इस जहां में आतंकी के आतंक का हो खात्मा उन्हें भी प्यार मिले इस जहां में बागों में खिले हर इक कली कहीं कुम्भला न जाए इस…

Read More

सुनो, कुछ तो करो

सुनो, कुछ तो करो सुनो… कुछ तो करो…! कि इससे पहले सब श्मशानों में तब्दील हो जाए…! कुछ तो करो…. कि इससे पहले घर… मकानों और खंडहरों में तब्दील हो जाए…! कुछ तो करो… इससे पहले कि दवाएँ जहरों में तब्दील हो जाएं…! कुछ तो करो…. इससे पहले कि भोजन खुद भूख में…. और भूख…

Read More

मजदूर

मजदूर जिसके सर पर छत है खुले आकाश का,होता रहता वज्रपात, फिर भी वह आत्मविश्वास से लबरेज है , वह है मजदूर। कंधों पर सपनों का बोझ ढो रहा, चला जा रहा मंजिल है दूर, अपने पसीने से भूमि सींचता,है श्रम से थक कर है वह चूर। अपने हथौड़े से करता एक-एक प्रहार,रखता जाता एक-…

Read More

बूढ़ी काकी

बूढ़ी काकी हिंदी कहानीकारों में मुंशी प्रेमचंद जी का प्रमुख स्थान है। उनकी कहानियां निम्न वर्ग को दर्शाती है। मानव समाज और जीवन के यथार्थ को दिखाना है उनकी कहानियों को विशेष बना देता है ।उनकी सभी कहानियां मर्मस्पर्शी है पर मुझे उनकी कहानी “बूढ़ी काकी” बहुत पसंद है। यह सामाजिक समस्या पर केंद्रित उत्सुकता…

Read More