लाल गुलाब

लाल गुलाब किताब के पन्नों के बीच रखा है आज भी तेरा दिया वो लाल गुलाब, आज भी बसती है उसमें सुगंध तेरे प्यार की। समेटे है ना जाने कितनी यादें तुम्हारी, वक्त ठहरता नहीं,कहीं भी,,, कभी भी। पर जम गये हैं मेरे हृदय पटल पर वो बीते हुए प्यारे लम्हें, जो कभी संग बिताये…

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साँझ

साँझ गाड़ी तेजी से पटना से राजगीर की ओर बढ़ रही थी। हल्की बूंदा-बांदी शुरू हो गई थी। आषाढ़ का महीना चढ़ा ही था। मोना सुबह आठ बजे पति राजेश के साथ घर से निकली थी। राजेश को ऑफिस के कार्य से वहाँ तीन दिनों के लिए रूकना था। मोना की एक सहेली रीना राजगीर…

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बापू

बापू तुम्हारे वजूद से थी मेरे गुलिस्ताँ में रौनकें सारी, तुम्हारे बगैर इस दुनिया को मै वीरान लिखती हूँ …..बापू सभी रिश्तों पर खुब लिखा जाता हैं माँ पर दोस्ती पर ,आज मै अपने पापा के बाते  लिखूंगी, मै अपने पापा को बापू के सम्बोधन से पुकारती थी,जहाँ सब डैड कहते मै उन्हें बापू कहती…

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चेहरा बनाये बेदाग

चेहरा बनाये बेदाग स्कीन पर किसी प्रकार का दाग केवल आपकी खुबसूरती पर ही दाग नहीं है बल्कि आपके आत्मविश्वास को भी कम करता है । साथ ही साथ यह मानसिक तनाव का कारण भी बन जाता है। लेकिन आज के इस आधुनिक युग में अब प्रत्येक प्रकार के दाग का इलाज संभव है। केवल…

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ऊँची उड़ान को मिले पंख

ऊँची उड़ान को मिले पंख न्यू यॉर्क से दिल्ली तक की फ्लाइट ने दोनों का बुरा हाल कर दिया था और अब जेट लेग की समस्या से भी जूझना था । एयरपोर्ट से बाहर निकलते ही डीज़ल के धुएँ से भरी गर्म हवा और कानफोड़ू हॉर्न ने स्वागत किया । टैक्सी लेकर दोनों एरोसिटी के…

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मंत्र

मंत्र “मंत्र” कहानी डॉ चड्ढा की है जो अपने नियम पर चलते हैं और अपने समय पर मरीज देखते हैं। इसके अलावा वह अपने आनंद के लिए गोल्फ आदि में समय व्यतीत करते हैं।एक दिन एक आदमी आता है जो अपनी बीमार लड़के को देखने की अपील करता है।डॉक्टर चड्ढा के गोल्फ खेलने का समय…

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सरस्वती वंदना

सरस्वती वंदना अंधकार जब अम्बर पर छाये नव पल्लव नव उपमा लेकर ….माँ !तू आये …. निराशा के घोर भँवर में फंस जाये नया उत्साह नई उमंग लेकर ….माँ!तू आये ….. कठिन डगर चलना मुश्किल हो जाये नई शिक्षा का संचार लेकर ……माँ!तू आये… सुख समृद्धि की प्रबल कामना पूर्ण न पाये नई दिशा का…

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श्रमदान

श्रमदान आधी आबादी करती श्रमदान बिन वेतन ताजमहल यादगार निशानी “कटते हाथ” होते हैं पूरे मजदूरों के हाथों स्वप्न हमारे आनंदबाला शर्मा साहित्यकार जमशेदपुर, झारखंड 0

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माँ

माँ मैंने कितना ही उसका दिल तोड़ा फिर भी वह मुझे दिल का टुकड़ा कहती रही मैंने कितना भी उसे बुरा भला कहा फिर भी वह मुझे सूरज चंदा कहती रही मैंने कितना ही उसे सताया फिर भी वह मेरी राहों के कंकड़-कांटे चुनती रही क्योंकि वह मां थी शक्ति भर उसने हर विपदा से…

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पवन बसंती

पवन बसन्ती ये पवन बसन्ती मतवाली, फागुन आया पीत बसन राग रंग कुछ मुझे न भाता , जब से मथुरा गया किशन। सपना सा हो गया सभी कुछ, हुई कहानी सी बातें । रह रह उठती हूक हृदय में , कौन सुने मन की बातें। सोच रही थी अपने मन में, किशन कन्हैया मेरा है…

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