महकता बसंत

महकता बसंत महक रहा है हलका – हलका , बालों में गूँथा जो गजरा । बहक रहा है छलका – छलका , नयनन में हँसता वो कजरा । बिजुरिया सम दमके बिंदिया आँचल में मुखड़ा रही छिपाय । सजी धजी थिरके है सजनी , आस दीप नैन में चमकाय ! 2 बोल रही है बहकी…

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गणिका

गणिका ‘चरित्रहीन हो, बेगैरत हो, हो निर्लज्ज और कुल्टा’ ऐसे कितने तीर चला कर कहते हो मुझको गणिका ! शफ्फाक वस्त्र में सजे हुये, पर अंदर से उतने मटमैले, रुतबे वाले ,रँगे सियार, इस समाज में हैं फैले ! भूल के अपनी मर्यादा औ’ भूल के पत्नी का वह प्यार , काम पिपासा के कामातुर,…

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पहली कविता

पहली कविता बचपन के भावाें को सहेज अपने नन्हें हाथाें से लिखी मैने तितलियाें पर एक कविता । खुशी से थिरकती ,उछलती पहुॅंची पिता के पास कहा- पिता देखाे मैंने की है रचना लिखी है मैने कविता , पिता ने हॅंसकर माथा चूम लिया कहा,मेरी लाड़ली है यह मेरी प्यारी सुन्दर कविता । यह सुन…

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ईमानदार कोशिश करें

ईमानदार कोशिश करें आजादी के सत्तर साल बाद भी हम कई परेशानियों से जूझ रहे हैं ।सपने में भी जिसके बारे में हम सोचना नहीं चाहते, उस से दो -चार होना पड़ रहा है । दीमक की तरह चाट कर देश को खोखला करने वाली बुराइयाँ हमारे खून में रच-बस गयी हैं ।इनसे निजात पाना…

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माँ.. ममत्व और मातृत्व

माँ.. ममत्व और मातृत्व परमपिता ने हर रूह में बसाया मातृत्व भाव… अहो, पर जगत में आज बंधु ममता का देखो कैसा है अभाव.. कि मानव मानव के ही खून का बन बैठा है प्यासा देखो देखो तो जाकर के पाओगे हर मां का कलेजा दिन रात है फटता, आत्मा से निकलती चित्कार, आह चेहरा…

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माटी का सपूत

माटी का सपूत देशभक्ति अपने उबाल पर थी, जय हिंद के नारों से गली-गली, मोहल्ला-मोहल्ला गूंज उठता था, समूचा देश एक क्रांति के दौर से गुजर रहा था । आए दिन देशभक्ति और वीरो की हुंकार देश की जनता के प्राणों में नये जोश भर देती थी, देशभक्तों की टोलियों द्वारा योजनाएँ बनाकर ट्रेनों पर…

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मेरे अंतस के बुद्ध

मेरे अंतस के बुद्ध बुद्ध ना सिर्फ कपिलवस्तु में थे और ना ही मात्र कुशीनारा में, बल्कि वो तो सदैव से ही साधनारत थे मेरे भी मन की सुप्त गुफाओं में, क्योंकि महसूस करती हूं मैंने भी अक्सर वो असहनीय वेदना जो बूढ़े , बीमार और लाचार को देख कर उमड़ती है, गरीबों की दयनीयता…

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भारत बनाम इंडिया विकास-गाथा !!

भारत बनाम इंडिया विकास-गाथा !! अनेक नामों में इस देश का एक नाम है भारतवर्ष। इस नाम में इसका प्राचीन गौरव समाहित है। ‘अमरकोश’ में वाचस्पति का एक श्लोक आता है- “स्यात भारतं किंपुरुष च दक्षिणां: रम्यं हिरण्यमयकर, हिमाद्रेरुत्तरास्त्राय:। भद्रश्वकेतुमालो तू द्वहो वर्षो पूर्वपश्चिमो इलाव्रित्त तू मध्यस्थ सुमेरुयर्ष तिष्ठति।।” इस श्लोक के अनुसार प्राचीनकाल में…

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सूना बैठक

सूना बैठक ना पीड़ा ना बीमारी ना संहार कोरोना लाया है पर्यावरण का बहार हवा स्वच्छ, नदियाँ स्वच्छ , पक्षी विचरण कर रहे स्वछन्द, ईश्वर की मार देख इंसान, कल तक जो करता था अहंकार, आज वही इंसान दुबक कर बैठा है आज बेबस, चक्र है यह ईश्वर का कि………….. जिंदगी ने दिखाया ये रंग…

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