फागुन

                                                     फागुन                          माघ बीता फागुन आया, लाया रंगों की बौछार,  होली में…….                         कजरारे नैनों की भाषा,  कुंदन बदन की अभिलाषा,                           है वह निपट गंवार अनाड़ी, जो न समझे होली में…….                                कैरी टपकी, कोयल कूकी, टेसू दहका, भौंरा बहका,                            कनकनी दूर हुई,  पानी पर आया प्यार होली में…….                            छ्र्रर्र्र पिचकारी बरसे,  उड़े अबीर गुलाल के…

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मनीराम दीवान

मनीराम दीवान अठारहवीं शताब्दी में अंग्रेज चाय चीन से खरीदते थे। मगर उनकी व्यापार में बेईमानी और लाभांश पर सौ प्रतिशत कब्जा चीन को नष्ट किये दे रहा था। अतः एक बड़ा युद्ध हुआ जिसमे चीन ने अंग्रेजों को चाय देने से इंकार कर दिया।जिससे उनका चीन की चाय पर से एकाधिकार जाता रहा।उधर अमेरिका…

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इसके बाद

इसके बाद महामारी बची आँखों को दे जायेगी भविष्य में देखने वाली तीसरी आँख कटेंगी हाथ की हथेली में समान्तर चलने वाली दो जीवन रेखाएँ अनिवार्य होगा भूख के अर्थशास्त्र में श्वाँसो का निवेश नये इतिहास में सर्वाधिक गतिशील होंगी वर्तमान के कारावास में बंदी तारीखें काट कपट के बीज से उगे उन्मादी विषैले फल…

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जीवन का सफरनामा

जीवन का सफरनामा मेरे साहित्यिक क्षेत्र में ही नहीं अपितु जीवन में भी जो प्रेरणापुंज हैं उनके लिए आज शब्दों के जरिये मन के हर कोने को खंगालकर जो भाव निकले उन्हें व्यक्त करने की कोशिश कर रही हूँ। मेरा जन्म दुर्ग(छग) में हुआ लेकिन मेरे मां पापा गाँव में रहते थे, तब वहां अच्छे…

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एक सख्त खलनायक

एक सख्त खलनायक धूप में बहते अपने पसीने, कठोर परिश्रम और पीड़ा के लिए वह देखना चाहता था उसकी आँखों में प्रेम, आर्द्रता और करुणा परन्तु वह देखता था रूखापन, कठोर अनुशासन और धैर्य क्योंकि पिता जानता है कि दुनिया निर्मम, निर्मोही और निष्ठुर हैं बच्चों के लिए जरूरी है माँ की छाया में रहते…

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“कुछ कही, कुछ अनकही”

“कुछ कही, कुछ अनकही” जीवन में अनेक पहलू ऐसे आते हैं जो अंतस में खलबली तो मचाते हैं पर उसको बाहर लाना सरल नहीं होता और यही बात कई बार अंदर घुटन उत्पन्न करती है तो अनेकों बार हम उसी में खुशी ढूंढ लेते हैं। ज़िन्दगी के यही चढ़ते-उतरते पड़ाव हमारे जीवन की कहानी बन…

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अनाथालय

अनाथालय   ये क्या है! मीटिंग में भी कोई – कोई आता है। लेटर में तो लिखा रहता है कि सबको अटेंड करना अनिवार्य है। लिखने – पढ़ने का कोई अर्थ नहीं है। बारह स्कूल से ग्यारह मुंडी। कम से कम पैंतीस – चालीस जन होंगे। हर बार यही होता है। अभी पाण्डेय जी कहेंगे…

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नारी !

नारी ! प्रेम और ममता की मूर्ति त्याग और बलिदान का एहसास निज आंचल में समेटे सारी धरती सारा आकाश! जिसकी आंखों में है करुणा सहनशक्ति है जिसकी परिभाषा, निराशा के तम की जो दूर करे नारी ही है वो आशा!! नारी! पहचान है कोमल भावनाओं की तो कभी कठोरता की गर ये जननी है…

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शत शत नमन

  शत शत नमन ममता से ओतप्रोत वे सभी ममतामयी सम्मानीय माताएं जिनका प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों ही रूप से मेरे और मेरे अपनों के जीवन में महत्वपूर्ण योगदान रहा हैं उन सभी माताओं एवं मेरी जन्मभूमि भारत माता के श्री चरणों में मैं सत् सत् नमन करता हूं एवं ईश्वर से प्रार्थना करता हूं…

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