हिन्दी और हम
हिन्दी और हम हर देश की आबोहवा में रची होती है वहाँ की भाषा, ।साँस की तरह जिलाए रखती है, रीत, प्रीत, जन, मन, संस्कृति, संस्कारों को। अपनी माटी में जैसे पेड़ सिर उठाये खड़ा रहता है, बिल्कुल वैसा ही संबल मिलता है अपनी भाषा से…. क्या संसार में कहीं का एक दृष्टांत उद्धृत कर…