पुत्री को पत्र

पुत्री को पत्र प्रिय तान्या खुश रहो कुछ दिनों से देख रही हूँ तुम बीच बीच में बहुत भावुक हो जाती हो।कल ही तुमने बातों बातों में मुझसे कहा कि माँ कभी-कभी लगता है मैं तुम्हारेजैसी होती जा रही हूँ। अब तो वही सब करने लगी हूँ जिनका मैं कभी मजाक बनाया करती थी। माँ तुम्हारा…

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भारत के महानायक:गाथावली स्वतंत्रता से समुन्नति की- प्रेमचंद

कलम के सच्चे सिपाही-मुंशी प्रेमचंद “मैं एक मज़दूर हूँ, जिस दिन कुछ लिख ना लूँ, उस दिन मुझे रोटी खाने का कोई हक़ नहीं। ” मुंशी प्रेमचंद जी की कहानियाँ और उपंयास पढ़ कर हम बड़े हुए। मुझे उस उम्र में नहीं मालूम था कि उन कहानियों का क्या योगदान था भारतवर्ष की आज़ादी मिलने…

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नथ

नथ सकीना आफ़ताब से लिपट कर ,हिचकी ले लेकर रोये जा रही थी ,बड़ी-बड़ी पनियाई आंखें कमल पर गिरे ओस की बूंदों सी खूबसूरत लग रही थीं। आफ़ताब किसी छोटे से बच्चे की तरह सकीना को बाहों में भरे कभी उसके माथे को चूमता तो कभी उसकी बिखरी लटों को संवारते हुए उसे समझाने की…

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कहां से कहां आ गए

कहां से कहां आ गए कौन थें हम हम वही थें जो ईंट और गारा के लिए झगड़तें थें पशुओं की तरह लड़ते थें रक्त के रंग को नकारते रहें अलग अलग सोचते और अलग अलग विचारते रहें आपसी संबंध हमारे एक दूजे को नीचा दिखाने पर तुले रहें हम कितने अच्छे और कितने भले…

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पवन बसंती

पवन बसन्ती ये पवन बसन्ती मतवाली, फागुन आया पीत बसन राग रंग कुछ मुझे न भाता , जब से मथुरा गया किशन। सपना सा हो गया सभी कुछ, हुई कहानी सी बातें । रह रह उठती हूक हृदय में , कौन सुने मन की बातें। सोच रही थी अपने मन में, किशन कन्हैया मेरा है…

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उम्मीद की टिमटिमाती लौ

उम्मीद की टिमटिमाती लौ हुक्का चिलम बनवा लो , गले का हार बनवा लो , हाथ की घडी़ बनवा लो…… चिल्लाते हुए दढ़ियल बाबा हर उस जगह ज़रा दर और ठहर जातें , जहाँ बच्चे खड़े होते थें । ” घर के बड़े चिढ़ कर कहतें … … ये लो जी , आज फिर आ…

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हमारी मातृ भाषा हिंदी

हमारी मातृ भाषा हिंदी हिन्दी हमारी मातृभाषा सरल ,सुन्दर और प्रभावशाली। समृद्ध भी है, साहित्य अपार है। फिर भी उपेक्षित, निम्न, और कंगाल है।अपने बच्चों द्वारा ही तिरस्कार है। अभिवादन, प्रशंसा, धन्यवाद सभी पर, विदेशी का अधिकार है। धीरे-धीरे घरों मैं बढ़ रहा इसका व्यवहार है। लिखित कथन अंग्रेजी वर्णमाला पर निसार है। यही प्रगति…

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महिला सशक्त भी है और सक्षम भी

महिला सशक्त भी है और सक्षम भी महिला सशक्तिकरण और सक्षमीकरण की नारेबाजियों का दौर है। जो मन में अनेक विचारों को जन्म देता है। मैं स्वयं एक स्त्री हूँ,.. स्त्री वर्ग के लिए आगे आकर कार्य करती हूँ, सृजन के क्षेत्र में स्त्री विमर्श से बचती हूँ क्योंकि मैं स्त्री पुरुष के विमर्श की…

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रीता रानी की कविताएं

रीता रानी की कविताएं 1.अनुपात – समानुपात किसी भी शोक को सभी ने अपने-अपने पाव में नापा , प्रविष्ट हुए सब अपनी- अपनी खोह में , दुख की कालिमा को देखने के लिए । थोड़ी देर के लिए शोक समानुपातिक हो गया , इस तरह व्यक्तिगत होकर भी वह सार्वजनीन हो गया ।   समाज…

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