उल्टा पुराण

उल्टा पुराण नेहा शादी कर जब पहली बार अपनी ससुराल आई ,तब उसे पता चला उसके ससुराल वालों का विचार उससे कितना भिन्न है। नेहा अपनी माँ बाप की इकलौती संतान थी। यौवन के दहलीज पर वो कदम रखी ही थी, कि उसकी शादी हो गई। दरअसल एक अच्छा खाते पीते घर का लड़का उसके…

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बासी परांठा, दालमोठ-चाय और बालकनी का एक कोना

बासी परांठा, दालमोठ-चाय और बालकनी का एक कोना मेरी जिन्दगी की सबसे ज्यादा प्रिय चीजों में, बासी परांठा, दालमोठ-चाय और बालकनी का यह कोना शुमार है। जब भी मैं उदास होती हूँ या फिर बहुत खुश…… किसी से फोन पर बात करनी हो या चुपचाप ग़ालिब की ग़ज़ल आबिदा परवीन की आवाज़ में सुननी हो…

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जात न पूछो साधू की….

जात न पूछो साधू की…. वातावरण की गंभीरता को अपने अंदर समेटते हुए मंत्र गूंज रहा था… न जायते म्रियते वा कदाचित् नायं भूत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥ गंगा जब यह मंत्र पढ़कर नानाजी की तेरहवीं के कर्मकांड करवा रही थी, तब मुझे लगा कि अब नानाजी…

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जादू टोना

जादू टोना “माँ इतने समय बाद हम गाँव आये हैं । यहाँ का वातावरण शहर से अभी तो शांत है मगर देखो न यहाँ भी हर घर में अब कार स्कूटर हो गए हैं। लोगों ने जैसे पैदल चलना ही छोड़ दिया।” विस्मित सी मालती चारों ओर खेतों को निहारती हुई बोली। “बेटा इसे ही…

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बेटी

बेटी नये इलाके में उन लोगों का अभी तक सभी से पूरा परिचय भी नहीं हुआ था। शाम को श्याम किशोर और उनकी पत्नी जब घूमने निकलते तब कुछ लोगों से बातचीत के माध्यम से परिचय हो रहा था। साथ में रहने वाली बीना को केवल अपने ड्युटी और घर से ही मतलब था इसके…

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लैंडलाइन प्रेम

लैंडलाइन प्रेम   यह प्रेम कहानी उस ज़माने की है जिस वक़्त मोबाइल फोन नहीं थे और लैंड लाइन के फोन के तारों के इर्द-गिर्द घूमती थी यह दुनिया। लैंड लाइन का फोन भी हर किसी के घर में नहीं होता था और लैंड लाइन का फोन रखना एक रुतबे की बात मानी जाती थी।…

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अनाथालय

अनाथालय   ये क्या है! मीटिंग में भी कोई – कोई आता है। लेटर में तो लिखा रहता है कि सबको अटेंड करना अनिवार्य है। लिखने – पढ़ने का कोई अर्थ नहीं है। बारह स्कूल से ग्यारह मुंडी। कम से कम पैंतीस – चालीस जन होंगे। हर बार यही होता है। अभी पाण्डेय जी कहेंगे…

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हाउसबोट

हाउसबोट   उस हाउसबोट में शबाना की हैसियत एक अदना सी नौकरानी की थी। कभी चाय, कभी कॉफ़ी, कभी कहवा, कभी जलपान तो कभी खाना पहुँचाने के बहाने वह सुनील के कमरे में आने-जाने लगी थी। सुनील का भोलापन उसके हृदय में बस गया था। परिचय प्रगाढ़ होता गया और एक माह कैसे गुज़र गया,…

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न्याय

न्याय क्षितिज पर आषाढ़ के काले मेघ घुमड़ रहे थे. धरती और बादलों का मिलन बिंदु धुआँ धुआँ हो रहा था. बादल थे कि रह रह कर बरसने का उपक्रम कर रहे थे मानों अपना समूचा प्रेम आज ही धरा पर उड़ेल देना चाह रहे हों. ” तनिक देखो तो! कल कितनी तीव्र ग्रीष्म वेदना…

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वो लड़का

वो लड़का वो लड़का जिसे मैंने बेहद करीब से जाना था, उसके संघर्षों की साक्षी रही हूँ, आज न्याय-व्यवस्था के शीर्ष पद पर शपथ ले रहा था। उसकी आँखों में खुशी और गम की बूँदे झलक रही थी। शपथ-कार्यक्रम में जो भी शामिल थे – करीबी, परिवार, दोस्त सभी उस पल के साक्षी थे। अगर…

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