हिंदी है भारत की कला व संस्कृति की पहचान

हिंदी है भारत की कला व संस्कृति की पहचान विश्व करे इसका सम्मान । संस्कृत की बेटी हिंदीभाषियों की है शान। भारतीय कला व संस्कृति की यही है पहचान । तभी तो भारतेंदु ने लिखा था। – निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति कौमूल, बिनु निज भाषा ज्ञान के मिटै न हिय कौ सूल ।…

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संदेशे आते हैं

संदेशे आते हैं   नव वर्ष के अनेक सन्देश मेरे मोबाईल पर दोस्तों और रिश्तेदारों के आये। सबों को यथोचित धन्यवाद ,शुभकामनाएं भेजती जा रही थी। कुछ ऐसे भी नंबर थे जो अपरिचित थे पर शुभकामनाएं ही तो दे रहा है बेचारा जो भी है यह सोच कर प्रत्युत्तर दे रही थी। अचानक एक सन्देश…

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वाफर का तॉरेपकिऊ

वाफर का तॉरेपकिऊ वाफर के दूरवर्ती गाँव का “गाँव बुड़ा’ (प्रमुख), 75 वर्षीय तॉरेपकिऊ, अपने पर्यावरण हितैषी घर के अहाते में मनोभावन धूप सेक रहा था। यह गाँव नागालैंड के टूयेनसांग जिले के समतोर ब्लॉक में अवस्थित था। 2 अगस्त, 2010 अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही गर्म था। पिछली रात की लगातार वर्षा…

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घर में भेड़िये

घर में भेड़िये   रात भर इमली दर्द से कराहती रही,पोर पोर फोड़े की तरह पिरा रहा था।उसे जानवरों की तरह पीटा गया।कसूर—नारी निकेतन की संचालिका के पति को उसने चाँटा मारा। उसकी हवस की टपकती लार के विरोध में —- “माई,हमको ये बापू बहुत मारता है,चिमटी काटता है,उसकी बात न माने तो हाथ मरोड़ता…

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संवत्सर के नये सृजन का

संवत्सर के नये सृजन का संवत्सर के नये सृजन का प्राण प्राण वन्दन अभिनन्दन।। पीत पर्ण पर नन्ही कोपल, मन मन को आह्लादित करती। घनी अमा से उतरी किरणें, जन जन को संबोधित करती। पांखुर पांखुर गीत लिखें तितली फूलों का मधु रंजन।।१।। सुनहली शाटिका धृता पर कुंतल बीच पलाश सिंदूरी। कर्णसुसज्जित पारिजात ज्यूं ओढ़…

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ओ सितंबर

ओ सितंबर ओ सितंबर ! तुम आ ही गए. गुनगुनाते से कुछ छोटे होते दिन और मीठी सी सिहरन वाली लंबी रात लिए. ठहरी हुई हवा एक भूला-सा नगमा सुना रही है. चिनार ने फिर बिखरा दी है एक सुनहरी चादर….. पत्तो के बदलते रंग जैसी ख्वाहिशें भी कुछ और अमीर हो गयी हैं. पेड़ो…

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सब माया है

सब माया है वह अकेला रह गया था। सोने के पिंजरे और सोने की कुर्सी पर बैठा ‘अकेला आदमी’। वह हमेशा से अकेला नहीं था। अपने भरे पूरे परिवार में पांच बहनों के बीच इकलौता भाई सबका लाड़ला था। पिता थोड़े कड़क स्वभाव के थे, सो बच्चों और पिता के बीच हमेशा एक कम्युनिकेशन गैप…

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रंगभूमि

रंगभूमि प्रेमचंद ने अपने लेखन की शुरुआत आदर्शात्मक रुझान से की थी। प्रेमचंद अपने संक्षिप्त रचना काल में कई मार्गों पर चले और कुछ दूर चलकर अगर उन्हें खटका होता था तो राह बदल लेते थे। सुधार वाद ,आदर्शवाद ,गांधीवाद और साम्यवाद यह सभी उनके मार्ग रहे। हिंदी कथा साहित्य को जीवन की यथार्थता और…

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बेटा मजदूरिन का

बेटा मजदूरिन का एक बेटा मजदूरिन का, मुँह ना देखा था पिता का। दहलीज पर झोपड़ी के, था ,तरसता भूख से, तलाशती आँखों से माँ को, हर चेहरे को निहारती। थकी पलकों को सहला जाती, नींद अपने आँचल में। कभी जागता कभी सोता। ना जाने माँ कब आयेगी। सिने से लगायेगी, लाल को एक था…

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सर्वं शिवमयं जगत

सर्वं शिवमयं जगत ‘सर्वं शिवमयं जगत:’ – इस जगत में सबकुछ शिव का ही प्रकटीकरण है। वह सबसे सुंदर हैं तो सबसे भद्दे और बदसूरत भी। अगर वो सबसे बड़े योगी व तपस्वी हैं तो सबसे बड़े गृहस्थ भी। वह सबसे अनुशासित भी हैं, सबसे बड़े पियक्कड़ और नशेड़ी भी। वे महान नर्तक हैं तो…

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