उजाले की ओर
उजाले की ओर शाम गहरा रही थी, एवं धूल भरी आंधियों के आसार नजर आ रहे थे। मैं तेज कदमों से भाग रही थी। बूंदा-बांदी शुरु हो चुकी थी। ओह! घर पहुँच तो जाऊँ बदरा तुम बरसते रहना। यों मौसम बड़ा ही सुहाना हो चला था। प्रचंड गर्मी से राहत तो मिली। सहसा सड़क किनारे…