पगली

पगली धूप पड़ती थी तो पड़ती ही रहती थी जैसे उसको पड़ने का मशगला हो आया हो ,उसकी तपिश के विरोध में यहां-वहां से छायाएं निकल आती थी, मग़र उसे कभी छांव में नही देखा था, वो तपती धूप में भी उसी नल वाले चबूतरे के पास बैठी रहती थी, जिसके एक तरफ बहते पानी…

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कैक्टस

कैक्टस दस दिन के दुधमुँहे मुन्ना को गोदी में लिए, देहरी पर खड़ी संचिता, कुछ अधिक खीझ और कम भय के साथ सामने बैठक में दीवान पर लेटे सचिन को देख रही थी। उसकी सास मनियादेवी अभी-अभी पैर पटकती इसी देहरी से बाहर निकली हैं। उनके स्वर का ताप संचिता के समूचे तन से लिपटा…

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मेरी प्रिय कहानी: ईदगाह

मेरी प्रिय कहानी: ईदगाह अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद के इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई।वह रोने लगी।दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझ पाता।…

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प्रेमचंद की युग चेतना

प्रेमचंद की युग चेतना कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद का साहित्य हिंदी साहित्य के इतिहास में टर्निंग प्वाइंट के रूप में माना जाता है ,जहां साहित्य जीवन और समाज के यर्थाथ से जुड़ता है ।प्रेमचंद्र का उद्देश्य जीवन और समाज को समझना था। उनकी पैनी दृष्टि जीवन के अनछुए पहलुओं को हमारे सम्मुख लाती हैं ,जो…

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निर्णय

निर्णय एक तो खुद अपने परिवार की इतनी बड़ी जिम्मेदारी और ऊपर से मौसमी के घर की पहरेदारी। और भी तो कितने पड़ोसी हैं ,सबके साथ मौसमी की अच्छी पटती भी है।कई बार सोची कि मौसमी से कह दूं कि तुम अब चाबी किसी और के घर में रखा करो। पर पता नहीं क्यों मैं…

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ये पात्र हर तीसरे घर में हैं ….

ये पात्र हर तीसरे घर में हैं …. प्रेमचन्द को याद करते ही ढेर सारे पात्र साथ साथ चले आते हैं, दिमाग में मन्डराने लगते हैं फ़िर चाहे वह धुनिया,झुनिया, गोबर, होरी, निर्मला, तोताराम हों या कहानियों में से झांकते हलकू, अलगू जुम्मन ,खाला, बड़े घर की बेटी, बुधिया, हामिद, दादी, हीरा मोती की जोडी…

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सौत

सौत प्रेमचंद जी ने अपने लेखन में शायद ही किसी मानवीय सम्बन्धों के आयाम पर अपनी कलम चलाने से खुद को अलग रखा हो |किसी भी रिश्ते की गहराई तक पहुँच जाना उनके लेखन को ऊंचाइयों तक ले जाता है |भारतीय समाज का ढांचा आपसी संवेदना के कारण टिका रहता है जो भारतीय समाज का…

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हरफनमौला बंशी

हरफनमौला बंशी बंशी उठ जा! देख सभी उठ गए |सूरज पंक्षी पेड़ पौधे| देख गाय भी रंभा रही | उठ जा तू भी |बंशी को अम्मा परेशान सी झकझोर रही थी| वो चादर को सिर तक ओढ़ कर कमरे की कोने वाली चौकी पर अड़ा सा पड़ा हुआ था | उठ जा रे लड़के…. उठ…

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मेरे नाना-प्रेमचंद जी

मेरे नाना-प्रेमचंद जी हरे रंग की बड़ी सी जनता बस दरवाजे के सामने आकर रुक गई।सफेद खादी का कुर्ता पायजामा पहने मंद मुस्कान के साथ एक सज्जन उतरे। हमारे पिताजी और मामा जी ने आगे बढ़कर उनका स्वागत किया।वे पिताजी से गले मिले और मामा को अपने गले लगाया। बहुत आदर व प्रेम के साथ…

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